Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 618

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्रि꣣पा꣢दू꣣र्ध्व꣢꣫ उदै꣣त्पु꣡रु꣢षः꣣ पादो꣢ऽस्ये꣣हा꣡भ꣢व꣣त्पु꣡नः꣢ । त꣢था꣣ वि꣢ष्व꣣꣬ङ् व्य꣢꣯क्रामदशनानश꣣ने꣢ अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

त्रि꣣पा꣢त् । त्रि꣣ । पा꣢त् । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । उत् । ऐ꣣त् । पु꣡रु꣢꣯षः । पा꣡दः꣢꣯ । अ꣣स्य । इह꣢ । अ꣣भवत् । पु꣢न꣣रि꣡ति꣢ । त꣡था꣢꣯ । वि꣡ष्व꣢꣯ङ् । वि । स्व꣣ङ् । वि꣢ । अ꣣क्रामत् । अशनानशने꣢ । अ꣣शन । आनशने꣡इति꣢ । अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

Mantra without Swara
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि ॥

त्रिपात् । त्रि । पात् । ऊर्ध्वः । उत् । ऐत् । पुरुषः । पादः । अस्य । इह । अभवत् । पुनरिति । तथा । विष्वङ् । वि । स्वङ् । वि । अक्रामत् । अशनानशने । अशन । आनशनेइति । अभि ॥६१८॥

Samveda - Mantra Number : 618
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वह परमात्मा ‘त्रिपात्' है- [त्रीन् जन्मजरामृत्यून् पातयति] जन्म-मृत्यु जरा से अतीत है, [त्रिषु कालेषु पद्यते प्राप्यते विद्यते] तीनों कालों में सदा रहनेवाला है [त्रिषु लोकेषु पद्यते] तीनों लोकों में व्यापक है [त्रीणि ऋग्यजुषं साम च पादयति प्रापयति] ऋग्यजुः सामरूप मन्त्रों का ज्ञान देनेवाला वह (त्रिपात् पुरुष:) = सर्वव्यापक परमात्मा (ऊर्ध्वः) = क्लेश, कर्म, विपाक व आशयों से अपरामृष्ट (उदैत्) = ऊपर उठा हुआ है। 'असक्तम्' वह इस संसार में सक्त नहीं है। यद्यपि वे प्रभु इस संसार में सक्त नहीं हैं (पुनः) = फिर भी (अस्य) = इस त्रिपात् पुरुष की (पाद:) = [पद् गतौ] सारी क्रिया (इह) = इस त्रिगुणात्मक संसार में (अभवत्) = होती है। असक्त होते हुए भी वे प्रभु ‘सर्वभृत् चैव' सबका भरण करनेवाले हैं ही (तथा) = इसलिए वे प्रभु (विश्वङ) = [वि सु अञ्चति] सर्वतो व्याप्त हुए (अशनानशने) = चेतन और अचेतन - खानेवाले और न खानेवालेउभयविधि जगत् को (अभि) = सब ओर से (व्यक्रामत्) = विक्रम के द्वारा आने वश में स्थापित किये हुए हैं। प्रकृति पूर्ण परतन्त्र है, जीव भी कर्म करने में कुछ स्वतन्त्र होता हुआ फलभोग में परतन्त्र ही है। किसी प्रकार की आसक्ति न होने से ही उस प्रभु का शासन उत्कृष्टतम है। उस प्रभु के शासन में चलने पर मैं भी इस संसार में गतिशील रहता हुआ 'धर्मार्थ, तीनों पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाला 'त्रिपात्' बनता हूँ। काम'
Essence
त्रिपात् प्रभु का स्मरण करता हुआ मैं भी त्रिपात् बनने का प्रयत्न करूँ। 
Subject
त्रिपाद् पुरुष