Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 616

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
व꣣स꣡न्त इन्नु रन्त्यो꣢꣯ ग्री꣣ष्म꣡ इन्नु रन्त्यः꣢꣯ । व꣣र्षा꣡ण्यनु꣢꣯ श꣣र꣡दो꣢ हेम꣣न्तः꣡ शिशि꣢꣯र꣣ इन्नु꣡ रन्त्यः꣢꣯ ॥६१६

व꣣सन्तः꣢ । इत् । नु । र꣡न्त्यः꣢꣯ । ग्री꣣ष्मः꣢ । इत् । नु । र꣡न्त्यः꣢꣯ । व꣣र्षा꣡णि꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । श꣣र꣡दः꣢ । हे꣣मन्तः꣢ । शि꣡शि꣢꣯रः । इत् । र꣡न्त्यः꣢꣯ ॥६१६॥

Mantra without Swara
वसन्त इन्नु रन्त्यो ग्रीष्म इन्नु रन्त्यः । वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिर इन्नु रन्त्यः ॥६१६

वसन्तः । इत् । नु । रन्त्यः । ग्रीष्मः । इत् । नु । रन्त्यः । वर्षाणि । अनु । शरदः । हेमन्तः । शिशिरः । इत् । रन्त्यः ॥६१६॥

Samveda - Mantra Number : 616
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जैसा मन होता है, वैसा ही संसार प्रतीत होता है। मन उदास है तो संसार भी उदास लगता है और मन प्रसन्न हो तो संसार भी प्रसन्न दीखता है।

संसार-चक्र में फँसे मनुष्य को, ऊँच-नीच से विक्षुब्ध होने पर, शतशः आशाओं के भङ्ग होन पर मन की आकुलता से सभी ऋतुएँ व्याकुल-सा करनेवाली हो जाती हैं। उसके मुख से ऐसे वाक्य सुनाई पड़ते हैं कि 'क्या आफ़त की गर्मी है? अरे! ये झड़ तो खत्म ही नहीं होता; पतझड़ की हवाओं ने क्या शुष्कता उत्पन्न कर दी है, सरदी तो मारे ही चली जाती है, ये शिशिर तो शीर्ण ही कर देगी, वसन्त क्या आयी-कफ के उपचय व प्रकोप से यह हमारा अन्त ही कर देगी।' मन की प्रसन्नता के अभाव में सभी ऋतुएँ खराब लगती हैं और मनुष्य सदा रोता ही रहता है, परन्तु स्वास्थ्य, आवश्यक धन व प्रभुनाम-स्मरण से प्रसन्न अन्त:करणवाला व्यक्ति कहता है कि- १. (वसन्त इत् नु रन्त्यः) = अब निश्चय से वसन्त ऋतु कितनी रमणीय है। यह कुसुमों की आकरभूत ऋतु सारे संसार में ह्रास का विकास करनेवाली है। सारा संसार कैसा खुला हुआ प्रतीत होता है। २. (ग्रीष्म इत् नु रन्त्यः) = वसन्त के बाद अब ग्रीष्म भी कितनी सुन्दर है! शरीरों से पसीने की धाराओं का प्रवाह करती हुई यह शरीरों के

शोधन में लगी है। सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणों से सब मल व दुर्गन्ध को भस्म करके ही रुकेगा। ३. (वर्षाणि) = सूर्य के प्रचण्ड ताप के बाद ये वर्षा की बौछारें अत्यन्त सुन्दर लग रहीं हैं। भस्मीभूत मल को ये प्रवाहित करके समुद्र में पहुँचा कर विश्राम लेंगी। ४. (अनु) = अब वर्षा की शीतल बौछारों के बाद (शरद:) = सबको शीर्ण करनेवाली यह शरद् ऋतु भी कितनी सुन्दर है ! वर्षा में निर्मर्याद बढ़े हए मलिन जल अब फिर मर्यादाओं में आ गये हैं और कितने स्वच्छ प्रतीत होते हैं! मयूरों का उग्र मद शान्त हो गया है – वनस्पतियों की अतिमात्र उपज भी परिमित हो गई है। शरद् ऋतु ने सभी को विनीत-सा कर दिया है। ५. (हेमन्तः शिशिरः इत् नु रन्त्यः) = शरद् ऋतु के शोधन के बाद शरीर को फिर से उपचित करती हुईं ये हेमन्त और शिशिर ऋतुएँ भी सुन्दर हैं। वस्तुतः प्रभु से समय-समय पर लायी गई ये ऋतुएँ असुन्दर हो भी कैसे सकती हैं? प्रभु पूर्ण हैं तो उनका बनाया यह संसार क्या अपूर्ण होगा? नहीं! सब सुन्दर है–यदि मेरा मन सुन्दर है तो, अतः मुझे अपने मन को सुन्दर बनाकर 'वामदेव' बनना है—अपनी इन्द्रियों को निर्मल करके 'गोतम' बनना है। 
 
Essence
मन: प्रसाद को सिद्ध करके मैं संसार में प्रसाद को – रमणीयता को देखनेवाला बनूँ।
Subject
रमणीयता-ही-रमणीयता