Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 615

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
भ्रा꣡ज꣢न्त्यग्ने समिधान दीदिवो जि꣣ह्वा꣡ च꣢रत्य꣣न्त꣢रा꣣स꣡नि꣢ । स꣡ त्वं नो꣢꣯ अग्ने꣣ प꣡य꣢सा वसु꣣वि꣢द्र꣣यिं꣡ वर्चो꣢꣯ दृ꣣शे꣡ऽदाः꣢ ॥६१५

भ्रा꣡ज꣢꣯न्ती। अ꣣ग्ने । समिधान । सम् । इधान । दीदिवः । जिह्वा꣢ । च꣣रति । अन्तः꣢ । आ꣣स꣡नि꣢ । सः । त्वम् । नः꣣ । अग्ने । प꣡य꣢꣯सा । व꣣सुवि꣢त् । व꣣सु । वि꣢त् । र꣣यि꣢म् । व꣡र्चः꣢꣯ । दृ꣣शे꣢ । दाः꣣ ॥६१५॥

Mantra without Swara
भ्राजन्त्यग्ने समिधान दीदिवो जिह्वा चरत्यन्तरासनि । स त्वं नो अग्ने पयसा वसुविद्रयिं वर्चो दृशेऽदाः ॥६१५

भ्राजन्ती। अग्ने । समिधान । सम् । इधान । दीदिवः । जिह्वा । चरति । अन्तः । आसनि । सः । त्वम् । नः । अग्ने । पयसा । वसुवित् । वसु । वित् । रयिम् । वर्चः । दृशे । दाः ॥६१५॥

Samveda - Mantra Number : 615
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु - दर्शन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारी जिह्वा सदा प्रभु के नाम का जप करे। ‘तयपस्तदर्थभावनम्'=उसके नाम का जप और उस नाम के अर्थ का चिन्तन
 
यही योग में ईश्वर-साक्षात्कार का प्रथम उपाय बताया है। मन्त्र में कहते हैं कि हे (समिधान) = तेज से प्रकाशमान प्रभो! (दीदिवः) = ज्ञान की ज्योति से देदीप्यमान (अग्ने) = सारे संसार को अग्रगति देनेवाले प्रभो! (भ्राजन्ती) = आपके नामस्मरण से चमकती हुई (जिह्वा) = सदा (अन्तः आसनि) = मुख में (चरति) = गतिशील होती है अर्थात् मैं मुख से सदा आपके नामों का उच्चारण करता हूँ। प्रभु के नामोच्चारण से मेरी जिह्वा सदा चमकती रहती है। अपशब्दों से वह मैली नहीं होती।

२. हे अग्ने=प्रकाशस्वरुप प्रभो! (सः त्वम्) = वे आप (वसुवित्) = निवास के लिए आवश्यक सब साधनों को प्राप्त करानेवाले (न:) = हमें (पयसा) = [प्यायते:] आप्यायन-वृद्धि के दृष्टिकोण से (रयिम्) = धन तथा (वर्च:) = तेजस्विता (अदा:) = दीजिए जिससे हम (दृशे) = आपका दर्शन कर सकें। प्रभुदर्शन के लिए 'नमक, तेल, ईंधन' की चिन्ता से मुक्त होना भी आवश्यक है। ‘भूखे भजन न होई' । योगभ्रष्ट को प्रभु श्रीमताम् = धन-सम्पन्न घर में इसलिए जन्म देते हैं। धन के साथ शरीर की शक्ति भी आवश्यक है। निर्बलता से शरीर रोगाक्रान्त होकर ध्यान को विचलित करनेवाला हो जाता है। धन और स्वास्थ्य का लाभ करके ही हम अपना आप्यायन-वर्द्धन कर सकते हैं। एवं, जहाँ प्रभु के नाम का जप आवश्यक है। वहाँ धन व तेजस्विता भी प्रभु-दर्शन के लिए सहायक हैं। मैं धन प्राप्त करके धन में आसक्त न हो जाऊँ, परन्तु इतना निर्धन भी न होऊँ कि मेरी सारी शक्ति व समय पेट की व्यवस्था करने में ही समाप्त हो जाए।
Essence
उचित धन व शक्ति के साथ प्रभु-स्मरण मनुष्य को 'वामदेव गोतम' = प्रशस्त गुणोंवाला, प्रशस्तेन्द्रिय बनाता है।
Subject
प्रभु दर्शन के लिए