Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 613

1875 Mantra
Devata- आत्मा अग्निर्वा Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡र꣢स्मि꣣ ज꣡न्म꣢ना जा꣣त꣡वे꣢दा घृ꣣तं꣢ मे꣣ च꣡क्षु꣢र꣣मृ꣡तं꣢ म आ꣣स꣢न् । त्रि꣣धा꣡तु꣢र꣣र्को꣡ रज꣢꣯सो वि꣣मा꣡नोऽज꣢꣯स्रं꣣ ज्यो꣡ति꣢र्ह꣣वि꣡र꣢स्मि꣣ स꣡र्व꣢म् ॥६१३॥

अ꣣ग्निः꣢ । अ꣣स्मि । ज꣡न्म꣢꣯ना । जा꣣त꣡वे꣢दाः । जा꣣त꣢ । वे꣣दाः । घृत꣢म् । मे꣣ । च꣡क्षुः꣢꣯ । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । मे꣣ । आस꣢न् । त्रि꣣धा꣡तुः꣢ । त्रि꣣ । धा꣡तुः꣢꣯ । अ꣣र्कः꣢ । र꣡ज꣢꣯सः । वि꣣मा꣡नः꣢ । वि꣣ । मा꣡नः꣢꣯ । अ꣡ज꣢꣯स्रम् । अ । ज꣣स्रम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ह꣣विः꣢ । अ꣣स्मि । स꣡र्व꣢꣯म् ॥६१३॥

Mantra without Swara
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म आसन् । त्रिधातुरर्को रजसो विमानोऽजस्रं ज्योतिर्हविरस्मि सर्वम् ॥

अग्निः । अस्मि । जन्मना । जातवेदाः । जात । वेदाः । घृतम् । मे । चक्षुः । अमृतम् । अ । मृतम् । मे । आसन् । त्रिधातुः । त्रि । धातुः । अर्कः । रजसः । विमानः । वि । मानः । अजस्रम् । अ । जस्रम् । ज्योतिः । हविः । अस्मि । सर्वम् ॥६१३॥

Samveda - Mantra Number : 613
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वीर्य के संयम-उसकी ऊर्ध्वगति द्वारा अपने जीवन को 'आङ्गिरस' बनाकर मनुष्य ‘विश्वामित्र'=सभी के साथ स्नेह करनेवाला और सच्चे अर्थों में 'गाथिन:' = प्रभु का स्तोता बनता है। यह अपने जीवन का निर्माण निम्न प्रकार आत्मप्रेरणा देता हुआ करता है- १. (अग्निः अस्मि जन्मना) = मुझे प्रभु ने स्वभावतः अग्नि आगे बढ़नेवाला बनाया है। मैं अपने स्वभाव को क्यों नष्ट करूँ? 'आगे बढ़ो' यही मेरे जीवन का लक्ष्य हो । २. क्या शरीर, क्या मन और क्या बुद्धि सभी दृष्टिकोणों से आगे बढ़ता हुआ मैं ('जातवेदा') = अधिक-से-अधिक ज्ञानी-सर्वज्ञ-कल्प बनने का प्रयत्न करूँ। ३. (घृतं मे चक्षुः) = मेरी आँखों में दीप्ति हो–सर्वप्रथम स्वास्थ्य के कारण, उससे बढ़कर मनः प्रसाद के द्वारा और वास्तव में तो ज्ञान मेरी आँखों को दीप्त करनेवाला हो। ४. अमृतं मे आसन्- मेरे मुख में अमृत हो। मैं उस ज्ञान का प्रचार अमृतमयी वाणी से करनेवाला बनूँ। ५. मैं (त्रिधातुः) = सात्त्विक, राजस व तामस तीनों प्रजाओं का धारण करनेवाला बनूँ। अथवा शरीर, मन व बुद्धि तीनों को स्वाधीन करनेवाला मैं ६. (अर्कः) = सूर्य की भाँति तेजस्वी बनूँ। ७. (रजसो विमान:) = मैं अपने जीवन में रजोगुण का विशेष मानपूर्वक धारण करनेवाला होऊँ । रजोगुण के नितान्त अभाव में मेरी क्रियाशीलता का ही अन्त हो जाएगा। रजोगुण के प्राबल्य में मेरा ज्ञान आवृत्त होने की आशंका है, अतः उसके विशेष मानपूर्वक निर्माण से ८. (अजस्त्रा ज्योतिः) = मैं अपने जीवन को सतत ज्योतिर्मय बनाऊँ और ९. (हविः अस्मि सर्वम्) = पूर्णरूप से अपने को हवि बना डालूँ। प्राजापत्य यज्ञ में अपनी आहुति दे दूँ। सतत लोकहित में लगा रहूँ।
Essence
मैं अपने जीवन को उन्नत करके प्राजापत्य यज्ञ में प्रवृत्त हो जाऊँ।
 
Subject
उपदेष्ठा का जीवन