Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 609

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
प्र꣣क्ष꣢स्य꣣ वृ꣡ष्णो꣢ अरु꣣ष꣢स्य꣣ नू꣢꣫ महः꣣ प्र꣢ नो꣣ व꣡चो꣢ वि꣣द꣡था꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसे । वै꣣श्वानरा꣡य꣢ म꣣ति꣡र्नव्य꣢꣯से꣣ शु꣢चिः꣣ सो꣡म꣢ इव पवते꣣ चा꣡रु꣢र꣣ग्न꣡ये꣢ ॥६०९॥

प्र꣣क्ष꣡स्य꣢ । प्र꣣ । क्ष꣡स्य꣢꣯ । वृ꣡ष्णः꣢꣯ । अ꣣रुष꣡स्य꣢ । नु । म꣡हः꣢꣯ । प्र । नः꣣ । व꣡चः꣢꣯ । वि꣣द꣡था꣢ । जा꣣त꣡वे꣢दसे । जा꣣त꣢ । वे꣣दसे । वैश्वानरा꣡य꣢ । वै꣣श्व । नरा꣡य꣢ । म꣣तिः꣢ । न꣡व्य꣢꣯से । शु꣡चिः꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । इ꣣व । पवते । चा꣡रुः꣢꣯ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ ॥६०९॥

Mantra without Swara
प्रक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू महः प्र नो वचो विदथा जातवेदसे । वैश्वानराय मतिर्नव्यसे शुचिः सोम इव पवते चारुरग्नये ॥

प्रक्षस्य । प्र । क्षस्य । वृष्णः । अरुषस्य । नु । महः । प्र । नः । वचः । विदथा । जातवेदसे । जात । वेदसे । वैश्वानराय । वैश्व । नराय । मतिः । नव्यसे । शुचिः । सोमः । इव । पवते । चारुः । अग्नये ॥६०९॥

Samveda - Mantra Number : 609
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'भरद्वाज बार्हस्पत्य = दृढ़ शरीर व दीप्त मस्तिष्कवाला व्यक्ति [Who possesses a body of an athlete and the soul of a sage] कहता है कि (नः) = हमें (विदथा) = ज्ञानयज्ञों में प्रभु के (महः) = तेज का (प्रवच:) = खूब प्रवचन कर जो (प्र-क्षस्य) = [प्रकर्षेण क्षिपति] प्रकृष्टरूप से सर्वत्र निवास कर रहे हैं - सर्वव्यापक हैं, (वृष्णः) = शक्तिशाली हैं अथवा सुखों की वर्षा करनेवाले हैं, (अरुषस्य) = जो क्रोधशून्य - शान्त हैं। इस प्रभु के तेज का हमें इसलिए प्रवचन कर जिससे हम भी इसी तेज को अपना लक्ष्य बनाएँ। [भर्गः धीमहि] हम भी प्रभु की भाँति व्यापक मनोवृत्तिवाले, शक्तिशाली व शान्त बनने का प्रयत्न करें। उस प्रभु को पाने का मार्ग तो उस - जैसा बनना ही है। यह ठीक है कि

१. (जातवेदसे) = प्रत्येक पदार्थ को जाननेवाले [जातं जातं वेत्ति] उस प्रभु के लिए (मतिः) = मननशील, ज्ञानपुञ्ज व्यक्ति ही (पवते) = जाता है - प्राप्त होता है।

२. (वैश्वानराय) = सब मनुष्यों का हित करनेवाले उस प्रभु के प्रति (शुचिः) = पवित्र, स्वार्थ से शून्य पुरुष ही (पवते) = जाता है। प्रभु प्राणिमात्र का हित करते हैं - उस प्रभु को मैं भी 'सर्वभूतहिते रत:' होकर पा सकता हूँ। शुचि:- पवित्र- स्वार्थशून्य होकर मैं ऐसा कर सकूँगा। 

३. (नव्यसे) = [नु=स्तुतौ] उस स्तुत्यतम प्रभु के प्रति (सोमः इव) = विनीतता का पुतला बना हुआ व्यक्ति ही (पवते) = जाता है। अभिमान में अपनी स्तुति है, न कि प्रभु की । जितना-जितना मनुष्य अभिमान से ऊपर उठता है उतना - उतना उस प्रभु की स्तुति करनेवाला बनता है।

४. (अग्नये) = उस आगे और आगे ले-चलनेवाले प्रभु को (चारुः) = चरणशील - सुन्दर गतिवाला पुरुष ही प्राप्त होता है। आगे बढ़ने की वृत्ति से ही हम ‘अग्नि' नामक प्रभु को प्रसन्न कर सकते हैं |
 
Essence
प्रभु को पाने के लिए हमें सदा प्रभु के तेज की चर्चा को सुनना है और मननशील, स्वार्थशून्य, विनीत, सुन्दर आचरणवाला बनने का प्रयत्न करना है।
Subject
प्रभु के तेज की चर्चा