Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 606

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
ते꣡ म꣢न्वत प्र꣣थमं꣢꣫ नाम꣣ गो꣢नां꣣ त्रिः꣢ स꣣प्त꣡ प꣢र꣣मं꣡ नाम꣢꣯ जानन् । ता꣡ जा꣢न꣣ती꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯नूषत꣣ क्षा꣢ आ꣣वि꣡र्भु꣣वन्नरु꣣णी꣡र्यश꣢꣯सा꣣ गा꣡वः꣣ ॥६०६॥

ते꣢ । अ꣣मन्वत । प्रथम꣢म् । ना꣡म꣢꣯ । गो꣡ना꣢꣯म् । त्रिः । स꣣प्त꣢ । प꣣रम꣢म् । ना꣡म꣢꣯ । जा꣣नन् । ताः꣢ । जा꣣नतीः꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣣नूषत । क्षाः꣢ । आ꣣विः꣢ । आ꣣ । विः꣢ । भु꣣वन् । अरुणीः꣢ । य꣡श꣢꣯सा । गा꣡वः꣢꣯ ॥६०६॥

Mantra without Swara
ते मन्वत प्रथमं नाम गोनां त्रिः सप्त परमं नाम जानन् । ता जानतीरभ्यनूषत क्षा आविर्भुवन्नरुणीर्यशसा गावः ॥

ते । अमन्वत । प्रथमम् । नाम । गोनाम् । त्रिः । सप्त । परमम् । नाम । जानन् । ताः । जानतीः । अभि । अनूषत । क्षाः । आविः । आ । विः । भुवन् । अरुणीः । यशसा । गावः ॥६०६॥

Samveda - Mantra Number : 606
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अध्ययन)- १. सृष्टि के प्रारम्भ में प्रभु के (ते) = उन मानस पुत्रों ने (प्रथमम्) = सबसे पहले (गोनाम्) = वेदवाणियों के (नाम) = वाचकता का- अर्थ का (अमन्वत्) = मनन किया- जानने का प्रयत्न किया। एक-एक शब्द के अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जोकि इन वेदवाणियों में (त्रि:) = आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक-इन तीन दृष्टियों से (सप्त) = सात छन्दों में वर्णित हुए हैं। सात मुख्य छन्दों में वेदमन्त्र कहे गये हैं और उनमें प्रयुक्त अग्नि आदि शब्द भौतिक अग्नि, राजा तथा आत्मतत्त्व आदि के वाचक होकर त्रिविध अर्थों को प्रकट करनेवाले हैं।

(आत्मज्ञान) = इस प्रकार वेदवाणियों का अध्ययन करते हुए इन लोगों ने (परमं नाम) = वेदवाणियों के अन्तिम प्रतिपाद्य विषय उस प्रभु को (जानन्) = जाना । 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'–सभी वेदमन्त्र अन्त में उस प्रभु का ही प्रतिपादन करते हैं। 'प्रकृति के ज्ञान के द्वारा प्रभु को जानना' यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। (शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्मणि गच्छति) = शब्द ब्रह्म म्रे निपुण होकर ही परब्रह्म को जाना जाता है।

(स्तुति - ता: जानती) = इस प्रकार इन वेदवाणियों को अच्छी प्रकार जाननेवाली (क्षा:) = पृथिवीस्थ प्रजाएँ (अभ्यनूषत) = उस प्रभु का स्तवन करती हैं। इन्हें एक-एक प्राकृतिक रचना में प्रभु की महिमा दीखती है और ये उस महान् प्रभु के प्रति नतमस्तक हो उठती हैं। इनके मुखों से स्वभावतः ये शब्द निकल पड़ते हैं कि 'नमस्ते वायो' = हे सारे संसार को गति देनेवाले प्रभो! तुझे नमस्कार है।

(ज्ञान-प्रसार) - इन प्रभु-भक्तों का जीवन अकर्मण्य नहीं होता। ये पर्वत - कन्दराओं में स्तोत्रों का ही उच्चारण नहीं करते, अपितु ये प्राप्त ज्ञान को फैलाने के लिए यत्नशील होते हैं। (अरुणी:) = प्रकाशमयी, प्रभातकालीन सूर्य के प्रकाश की भाँति अन्धकार को दूर करनेवाली (गाव:) = वाणियाँ (आविर्भुवन्) = इनसे प्रकट होती हैं। ज्ञान के प्रसार के कार्य में ये मध्याह्न के प्रचण्ड सूर्य की भाँति न होकर प्रातःकालीन अरुण प्रकाश के समान होते हैं। मधुर, श्लक्ष्ण [smooth, not harsh ] वाणी से ही ज्ञान देनेवाले होते हैं।

(उत्तम कर्म-) ये प्रभु भक्त कोरे उपदेशक ही नहीं होते (यशसा) = इनका जीवन भी यशस्वी–उत्तम कार्यों से युक्त होता है। इनके मुख से ज्ञान का प्रकाश होता है, हाथों से उत्तम कर्मों का सम्पादन हुआ करता है। इनकी वाणी ज्ञान को और हाथ यश को फैलानेवाले होते हैं। इस प्रकार जीवन बितानेवाले ये व्यक्ति सचमुच 'वामदेव' = सुन्दर दिव्य गुणोंवाले 'गोतम' प्रशस्तेन्द्रिय बनते हैं।
Essence
हमारा जीवन 'अध्ययन, आत्मज्ञान, स्तुति, ज्ञानप्रसार व यशोयुक्त कर्मोंवाला हो । 
 
Subject
मानव विकास