Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 60

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उत्कीलः कात्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣य꣢म꣣ग्निः꣢ सु꣣वी꣢र्य꣣स्ये꣢शे꣣ हि꣡ सौभ꣢꣯गस्य । रा꣡य꣣ ई꣢शे स्वप꣣त्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शे꣢ वृत्र꣣ह꣡था꣢नाम् ॥६०॥

अ꣣य꣢म् । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣣स्य । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯स्य । ई꣡शे꣢꣯ । हि । सौ꣡भ꣢꣯गस्य । सौ । भ꣣गस्य । रायः꣢ । ई꣣शे । स्वपत्य꣡स्य꣣ । सु꣣ । अपत्य꣡स्य꣢ । गो꣡म꣢꣯तः । ई꣡शे꣢꣯ । वृ꣣त्रह꣡था꣢नाम् । वृ꣣त्र । ह꣡था꣢꣯नाम् ॥६०॥

Mantra without Swara
अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभगस्य । राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम् ॥

अयम् । अग्निः । सुवीर्यस्य । सु । वीर्यस्य । ईशे । हि । सौभगस्य । सौ । भगस्य । रायः । ईशे । स्वपत्यस्य । सु । अपत्यस्य । गोमतः । ईशे । वृत्रहथानाम् । वृत्र । हथानाम् ॥६०॥

Samveda - Mantra Number : 60
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अयम्)=यह (अग्निः)= आगे बढ़ने के स्वभाववाला जीव (सुवीर्यस्य) - उत्तम वीर्य का (ईशे) = ईश होता है। भोजन के अनुरूप शरीर में शक्ति का निर्माण होता है - तामस भोजन से तामस शक्ति, राजस से राजस व सात्त्विक से सात्त्विक । अग्रिङ सुवीर्य का ईश है, इसलिए हि-निश्चय से (सौभगस्य) = उत्तमता व सौन्दर्य का भी ईश है। अग्नि का यही पहला लक्षण है।

दूसरा लक्षण यह है कि यह अग्नि (रायः) = [रा दाने] देने योग्य धन का (इशे) = ईश होता है, क्योंकि यह सदा धन का दान में विनियोग करता है, इसीलिए स्(वपत्यस्य) = उत्तम सन्तान का भी ईश बनता है। ("श्रदस्मै वचसे नरो दधातन यदाशीर्दा दम्पती वाममश्नुतः ”) प्रभु कहते हैं कि इस वचन पर श्रद्धा करो कि दिल खोलकर दान देनेवाले पति-पत्नी सुन्दर सन्तान प्राप्त करते हैं। दान लोभ को नष्ट कर सब व्यसनों को नष्ट कर देता है, अतः पवित्र पति-पत्नी उत्तम सन्तान क्यों न पाएँगे?

इस अग्नि का तीसरा लक्षण यह है कि यह (गोमतः) = गोमानों का (ईशे) = मुखिया होता है। उस समय जबकि सब गौ रखते थे, सभी गोमान् थे। उन गोमानों में भी जो खूब उत्तम गौवें रखता है वह गोमानों का ईश (वृत्रहथानाम्)=वृत्र को मारनेवालों का भी ईश बनता है। कामादि वासनाएँ वृत्र हैं, गो- दुग्ध का सेवन करनेवाला उनसे बचा रहता है । यह दुग्ध सात्त्विक होने से सात्त्विक भावों को ही जाग्रत् करता है, इसीलिए वेद में गौ को रुद्र और आदित्यों को पैदा करनेवाली कहा गया है
Essence
मनुष्य सुवीर्य का ईश बन सौभाग्य का ईश बने, धन का दान करते हुए उत्तम सन्तान प्राप्त करे, गो- दुग्ध के सेवन से सात्त्विक वृत्तिवाला बने। इस प्रकार अपने को इन तीन उत्तम नियमों में बाँधकर मनुष्य मन्त्र का ऋषि ‘उत्कील' बने। 
Subject
अग्नि के तीन लक्षण