Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 594

1875 Mantra
Devata- अन्नम् Rishi- आत्मा Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣ह꣡म꣢स्मि प्रथम꣣जा꣡ ऋ꣣त꣢स्य꣣ पू꣡र्वं꣢ दे꣣वे꣡भ्यो꣢ अ꣣मृ꣡त꣢स्य꣣ ना꣡म꣢ । यो꣢ मा꣣ द꣡दा꣢ति꣣ स꣢꣫ इदे꣣व꣡मा꣢वद꣣ह꣢꣫मन्न꣣म꣡न्न꣢म꣣द꣡न्त꣢मद्मि ॥५९४

अ꣣ह꣢म् । अ꣣स्मि । प्रथमजाः꣢ । प्र꣣थम । जाः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । पू꣡र्व꣢꣯म् । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । अ꣣मृ꣡त꣢स्य । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯स्य । ना꣡म꣢꣯ । यः । मा꣣ । द꣡दा꣢꣯ति । सः । इत् । ए꣣व꣢ । मा꣣ । अवत् । अह꣢म् । अ꣡न्न꣢꣯म् । अ꣡न्न꣢꣯म् । अ꣣द꣡न्त꣢म् । अ꣣द्मि ॥५९४॥

Mantra without Swara
अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाम । यो मा ददाति स इदेवमावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि ॥५९४

अहम् । अस्मि । प्रथमजाः । प्रथम । जाः । ऋतस्य । पूर्वम् । देवेभ्यः । अमृतस्य । अ । मृतस्य । नाम । यः । मा । ददाति । सः । इत् । एव । मा । अवत् । अहम् । अन्नम् । अन्नम् । अदन्तम् । अद्मि ॥५९४॥

Samveda - Mantra Number : 594
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (ऋतस्य) = सत्य ज्ञान से परिपूर्ण वेदवाणी का (प्रथम-जा) = सृष्टि के प्रारम्भ में सबसे पहला उत्पत्तिस्थान (अस्मि) = हूँ। प्रभु ने ही अग्नि आदि ऋषियों को हृदयस्थरूपेण वेदज्ञान दिया। जीव का ज्ञान नैमित्तिक है- उसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की आवश्यकता है। हमने अपने गुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया और उन्होंने अपने गुरुओं से। इस प्रकार यह गुरु परम्परा हमें प्रत्येक सृष्टि के प्रारम्भ तक पहुँचाती है, जिस समय (देवेभ्यः) = सब विद्वानों से (पूर्वम्) = पहले होनेवाला वह प्रभु श्रेष्ठ-अरिप्र [निर्दोष] ऋषियों को ज्ञान देता है। वह ज्ञान जो (अमृतस्य) = मोक्ष को हमारी ओर (नाम) = झुकानेवाला है [नमयति] ।

वस्तुतः (यः) = जो भी (मा) = मेरे प्रति अपने को (ददाति) = देता है (सः) = वह (इत्) = ही (एव) = इस प्रकार ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा (आवत्) = अपनी रक्षा करता है। ज्ञान उसे वासनाओं का शिकार नहीं होने देता। यह भोगों में फँसता ही नहीं। उस व्यक्ति के लिए प्रभु कहते हैं कि (अहम् अन्नम्) = मैं ही अन्न हूँ - वह मेरा ही सेवन करता है - मेरा ही उपासक होता है।

इसके विपरीत जो व्यक्ति इन पार्थिव भोगों में फँस जाते हैं और नाना प्रकार से स्वादु अन्नों को खाने लगते हैं, उन (अन्नम् अदन्तम्) = स्वाद से अन्नों को खाने में लगे हुओं को अद्मि=मैं खा जाता हूँ। ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रभु 'रुद्र' होते हैं और ये स्वाद से अन्नों को खानेवाले व्यक्ति अन्त में उस प्रभु से रुलाये जाते हैं।

भोगों में न फँसकर, ज्ञानप्रधान जीवन बिताते हुए हम चित्तवृत्ति के निरोध से अपने स्वरूप को देखें [तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्] और इस मन्त्र के ऋषि ‘आत्मा' बनें। वास्तविक अन्न यह ‘आत्मा' ही है। इसी ‘अन्न' का इस मन्त्र में वर्णन है। इसी से मन्त्र ‘अन्न' देवताक है। ‘इस अन्न का सेवन हमारे त्रिविध कष्टों को समाप्त करनेवाला होगा' इस बात की सूचना मन्त्र के छन्द 'त्रि-ष्टुप्' शब्द से भी आ रही है । [ Stoping of the three]।
Essence
मैं आत्मदर्शन करूँ। आत्मा ही मेरा अन्न हो - मैं उसी का सेवन करूँ। इस अन्न के सेवन से मेरे त्रिविध कष्ट दूर हों ।
Subject
वह प्रभु ही हमारा ‘अन्न' हो