Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 588

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
य꣢स्ये꣣द꣢मा꣣ र꣢जो꣣यु꣡ज꣢स्तु꣣जे꣢꣫ जने꣣ व꣢न꣣꣬ꣳ स्वः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ र꣡न्त्यं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥५८८॥

य꣡स्य꣢꣯ । इ꣣द꣢म् । आ꣣ । र꣡जः꣢ । आ । र꣡जः꣢꣯ । यु꣡जः꣢ । तु꣣जे꣢ । ज꣡ने꣢꣯ । व꣡न꣢꣯म् । स्व३रि꣡ति꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । र꣡न्त्य꣢꣯म् । बृ꣣ह꣢त् ॥५८८॥

Mantra without Swara
यस्येदमा रजोयुजस्तुजे जने वनꣳ स्वः । इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत् ॥

यस्य । इदम् । आ । रजः । आ । रजः । युजः । तुजे । जने । वनम् । स्व३रिति । इन्द्रस्य । रन्त्यम् । बृहत् ॥५८८॥

Samveda - Mantra Number : 588
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘प्रभु गुणों से लिप्त होते हों' ऐसा तो हैं नहीं, परन्तु सृष्टि के निर्माण, धारण व प्रलय के शब्दों में प्रभु को भी रज, सत्त्व व तम से संयुक्त रूप में स्मरण किया जाता है। सृष्टि के निर्माण मे समय वे रज से युक्त होते हैं - इसी समय निर्माण के कार्य के कारण ये 'ब्रह्मा' कहलाते हैं। सृष्टि के निर्माण के साथ वे सर्वतोन्मुख होते हुए मानो अपने चतुर्दिक् मुखों से अपने मानस पुत्रों को वेदज्ञान भी प्राप्त कराते हैं। उस (रजो-युजः) = रजोगुण से युक्त (यस्य) = जिस ब्रह्म का (आ) = समन्तात् विस्तृत (इदम्) = यह ज्ञान है, वह (तुजे जने) = देनेवाले [तुज्= हपअपदह] मनुष्य को प्राप्त होता है। लोभ ज्ञानप्राप्ति का महान् विघ्न है। लोभ से बुद्धि विचलित हो जाती है। (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु का यह ज्ञान १. (वनम्) = सेवनीय है - संभजनीय है, सत्य होने से उपादेय है। २. (स्वः) = यह प्रकाशमय है - अथवा सुख देनेवाला है। ३. (रन्त्यं) = यह अत्यन्त रमणीय है। प्रारम्भ में वह रमणीय प्रतीत नहीं होता, परन्तु अभ्यास से वह अधिकाधिक सुन्दर लगने लगता है। ४. (बृहत्) = यह [बृहि वृद्धौ] हमारी सर्वतोमुखी वृद्धि का हेतु है।

इस ज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य दिव्य गुणों का विकास करता हुआ 'वामदेव' बन जाता है और प्रशस्तेन्द्रिय बनकर 'गोतम' कहलाता है।
Essence
सुखी, सुन्दर व समृद्ध बनाएगा। - तुज् - देनेवाले बनकर हम प्रभु के उस ज्ञान को प्राप्त करनेवाले बनें जो हमें
Subject
ज्ञान किसे प्राप्त होता है ?