Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 583

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शक्तिर्वासिष्ठः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त्वं꣢ ह्या३꣱ङ्ग꣡ दै꣢व्यं꣣ प꣡व꣢मान꣣ ज꣡नि꣢मानि द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ घो꣣ष꣡य꣢न् ॥५८३॥

त्व꣢म् । हि । अ꣣ङ्ग꣢ । दै꣣व्यम् । प꣡व꣢꣯मान । ज꣡नि꣢꣯मानि । द्यु꣣म꣡त्त꣢मः । अ꣣मृतत्वा꣡य꣢ । अ꣣ । मृतत्वा꣡य꣢ । घो꣣ष꣡य꣢न् ॥५८३॥

Mantra without Swara
त्वं ह्या३ङ्ग दैव्यं पवमान जनिमानि द्युमत्तमः । अमृतत्वाय घोषयन् ॥

त्वम् । हि । अङ्ग । दैव्यम् । पवमान । जनिमानि । द्युमत्तमः । अमृतत्वाय । अ । मृतत्वाय । घोषयन् ॥५८३॥

Samveda - Mantra Number : 583
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु के शिक्षणालय में अपने जीवन को शक्ति सम्पन्न बनाकर यह 'शक्ति' नामवाला हो गया है। यह काम-क्रोध को जीतने के कारण ‘वासिष्ठ' है। यह प्रभु से निवेदन करता
हे प्रभो! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चय से (अङ्ग) = [अगि गतौ] मेरे जीवन में सब उत्कृष्ट गति के साधक हैं, (पवमान) = आपके स्मरण से मेरा जीवन पवित्र होता है, आप (द्युमत्तमः) = सर्वाधिक प्रकाशमय हैं। आचार्य ने विद्यार्थी के जीवन में 'पवित्रता व ज्ञान प्रकाश' ही भरना होता है। परमेश्वर से उत्कृष्ट आचार्य सम्भव ही कहाँ है? इस शिक्षणालय में रहकर प्रभु के प्रति समर्पण द्वारा यदि सचमुच इनमें दिव्यता - दैवी सम्पत्ति का विकास हो जाता है तो इन्हें अन्य जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रह जाती । (दैव्यं जनिमानि) = दिव्यता के विकासवाले मनुष्य को वे प्रभु (अमृतत्वाय घोषयन्) = अमरता के लिए उद्घोषित करते हैं। ये व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठकर मुक्त हो जाते हैं, ब्रह्मसंस्थ होकर अमरता को पा लेते हैं।
Essence
मैं सदा उत्तीर्ण होता हुआ अमरता की ओर बढ़ें।
Subject
मैं उत्तीर्ण घोषित किया जाऊँ