Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 579

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऊर्ध्वसद्मा आङ्गिरसः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ द्यु꣣म्नं꣢ बृ꣣ह꣢꣫द्यश꣣ इ꣡ष꣢स्पते दिदी꣣हि꣡ दे꣢व देव꣣यु꣢म् । वि꣡ कोशं꣢꣯ मध्य꣣मं꣡ यु꣢व ॥५७९॥

अ꣣भि꣢ । द्यु꣣म्न꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । य꣡शः꣢꣯ । इ꣡षः꣢꣯ । प꣣ते । दिदीहि꣢ । दे꣣व । देवयु꣢म् । वि । को꣡श꣢꣯म् । म꣣ध्यम꣢म् । यु꣣व ॥५७९॥

Mantra without Swara
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुम् । वि कोशं मध्यमं युव ॥

अभि । द्युम्नम् । बृहत् । यशः । इषः । पते । दिदीहि । देव । देवयुम् । वि । कोशम् । मध्यमम् । युव ॥५७९॥

Samveda - Mantra Number : 579
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र में सोम के लाभों का वर्णन करते हुए गौरवीति ने कहा था कि सोम मुझे ज्ञानावस्थित चित्तवाला बनाता है। ज्ञान में स्थित यह व्यक्ति ऊपर और ऊपर उठता हुआ 'ऊर्ध्व-सद्मा' बनता है। यह अन्नमयकोश को अपना घर न बनाकर आनन्दमयकोश को बनाता है। इसका शरीर्-अङ्ग-प्रत्यङ्ग–सदा लोच - लचकवाला, रसमय बना रहता है, अतः यह ‘आङ्गिरस’ होता है। यह प्रभु से प्रार्थना करता है कि

१. (अभिद्युम्नम्) = मुझे ज्योति की ओर ले - चलिए । मैं अधिकाधिक प्रकाश को प्राप्त करनेवाला बनूँ। 

२. (बृहद् यशः) = मुझे सदा यशस्वी जीवन प्राप्त कराइए | मेरी विद्या विवाद के लिए न होकर ज्ञान के लिए, मेरा धन मद के लिए न होकर दान के लिए और मेरी शक्ति पर-पीड़न न कर पीड़ितों के रक्षण के लिए विनियुक्त हो ।

३. (इषस्पते) = हे प्रभो! आप सब प्रेरणाओं के पति हैं। मुझे आप अपनी प्रेरणाओं का सुननेवाला बनाइए।

४. (देव) = सब दिव्य गुणों से सम्पन्न प्रभो! (देवयुम्) = आप देव को अपने साथ जोड़ने की कामनावाले मुझे (दिदीहि) = सब बन्धनों से मुक्त कीजिए, बन्धनों से मुक्त होकर ही में आपसे मिल सकूँगा।

ऊर्ध्वसद्मा की इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु उसे प्रेरणा देते हैं कि (मध्यमं कोशम्) = अपने मध्यम कोश को अर्थात् मनोमयकोश को (वि युव) = अधर्म से पृथक् करके धर्म में विशेषरूप से संयुक्त कर। ‘सं मा भद्रेण पृङ्ङ्क्तम्, वि मा पाप्मना पृङ्ङ्क्तम्'=इस प्रार्थना को तू अपने जीवन में मूर्तरूप दे। मन की साधना से तेरी ये प्रार्थनाएँ पूरी होंगी।
Essence
ऊर्ध्वसद्मा अपने जीवन में ज्ञान, यश, प्रभु - प्रेरणा व दिव्य गुणों को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है ।
 
Subject
ऊर्ध्व-सद्मा