Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 572

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥५७२॥

सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥५७२॥

Mantra without Swara
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥

सोमः । पुनानः । ऊर्मिणा । अव्यम् । वारम् । वि । धावति । अग्रे । वाचः । पवमानः । कनिक्रदत् ॥५७२॥

Samveda - Mantra Number : 572
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जो व्यक्ति संसार के घटनाचक्र को बारीकी से देखता है वह 'चाक्षुष' है। यह कहीं भी न उलझता हुआ आगे बढ़ता जाता है, 'अग्नि' है। यह (सोमः) = शक्ति का पुञ्ज तथा विनीत (पुनान:) = अपने को निरन्तर पवित्र बनाने के स्वभाववाला (ऊर्मिणा) = अपने हृदय में उत्कर्ष को प्राप्त करने की उमंगों से (अव्यम्) = [अवनं अवः, तत्र साधुः] सर्वोत्तम रक्षणीय ज्ञान की (वारम्) = रुकावट अर्थात् कामादि वासनाओं को (विधावति) = विशेषरूप से शुद्ध कर डालता है-सफाया कर देता है। इन वासनाओं को समाप्त करके ही यह (वाचः अग्रे) = वाणी के - ज्ञान के शिखर पर पहुँचता है। यह (पवमानः) = औरों को भी पवित्र बनाने के हेतु से (कनिक्रदत्) = उन ज्ञानवाणियों का खूब उच्चारण करता है - इस ज्ञान का औरों को भी उपदेश देता है। 
Essence
स्वयं ज्ञानी बनकर औरों को ज्ञान प्राप्त कराना ही मानव का लक्ष्य होना चाहिए।
Subject
ज्ञान के शिखर पर