Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 559

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सिकता निवावरी Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ मती꣣नां꣡ प꣢वते विचक्ष꣣णः꣢꣫ सोमो꣣ अ꣡ह्नां꣢ प्रतरी꣣तो꣡षसा꣢꣯ꣳ दि꣣वः꣢ । प्रा꣣णा꣡ सिन्धू꣢꣯नाꣳ क꣣ल꣡शा꣢ꣳ अचिक्रद꣣दि꣡न्द्र꣢स्य꣣ हा꣡र्द्या꣢वि꣣श꣡न्म꣢नी꣣षि꣡भिः꣢ ॥५५९॥

वृ꣡षा꣢꣯ । म꣣ती꣢नाम् । प꣣वते । विचक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣡ह्ना꣢꣯म् । अ । ह्ना꣣म् । प्रतरीता꣢ । प्र꣣ । तरीता꣢ । उ꣣ष꣡सा꣢म् । दि꣣वः꣢ । प्रा꣣णा꣢ । प्र꣣ । आना꣢ । सि꣡न्धू꣢꣯नाम् । क꣣ल꣡शा꣢न् । अ꣣चिक्रदत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । हा꣡र्दि꣢꣯ । आ꣣विश꣢न् । आ꣣ । विश꣢न् । म꣣नीषि꣡भिः꣢ ॥५५९॥

Mantra without Swara
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसाꣳ दिवः । प्राणा सिन्धूनाꣳ कलशाꣳ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः ॥

वृषा । मतीनाम् । पवते । विचक्षणः । वि । चक्षणः । सोमः । अह्नाम् । अ । ह्नाम् । प्रतरीता । प्र । तरीता । उषसाम् । दिवः । प्राणा । प्र । आना । सिन्धूनाम् । कलशान् । अचिक्रदत् । इन्द्रस्य । हार्दि । आविशन् । आ । विशन् । मनीषिभिः ॥५५९॥

Samveda - Mantra Number : 559
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘सिकता निवावरी' समझती है कि १. (मतीनाम्) = बुद्धियों की (वृषा) = शक्तिवाला (पवते) = अपने जीवन को पवित्र बनाता है। २. (विचक्षणः) = यह विशेष-सूक्ष्म दृष्टिवाला होता है, अतएव (सोमः) = विनीत होता है। ज्ञान के ये दो परिणाम निश्चित ही हैं- पवित्रता और विनीतता । ३. यह पवित्र व विनीत व्यक्ति (अह्णाम्) = [अ+हन्] जिनका नष्ट करना कठिन है उन अभिमान की भावनाओं का (उषसाम्) = [उष् दाहे] अन्दर ही सन्तप्त करनेवाली काम-वासनाओं का तथा (दिव:) = लोभ के कारण उत्पन्न द्यूत वृत्ति का (प्रतरीतः) तैर जानेवाला होता है। ज्ञान के कारण यह अभिमान, काम व लोभ का शिकार नहीं होता। ४. इन वासनाओं का शिकार न होकर यह (सिन्धुनां प्राणा) = [सिन्धुनां= अपाम् - रेतसाम्] वीर्य शक्तियों का अपने में [प्रा=पूरणे ] पूरण करनेवाला होता है । इस प्रकार अपने जीवन को 'ज्ञानमय, पवित्र, विनीत, निर्वासन व शक्ति-सम्पन्न' बनाकर यह ५. (कलशान्) = शरीरधारियों के प्रति (अचिक्रदत्) = पुकार-पुकार कर धर्म का उपदेश देता है। और इस प्रकार लोकसंग्रह करता हुआ ६. (मनीषिभिः) = सदा मननशील विद्वान् मित्रों के साथ चर्चा करता हुआ (इन्द्रस्य) = उस प्रभु के (हार्दि) = हृदय में (आविशत्) = प्रवेश करता है। वैसे तो प्रभु सभी के हृदयों में सदा से हैं, परन्तु इस विनीत ज्ञानी का हृदय तो वासनाओं का निवास स्थान न रहकर प्रभु का ही निवास स्थान हो जाता है। और यह सदा इस प्रभु के हृदय में प्रवेश करता है। इस अन्तिम वाक्य का अर्थ इस रूप में भी कर सकते हैं कि वह प्रभु के रहस्य को समझने लगता है।
Essence
हम ‘अभिमान, काम व लोभ' के समुद्रों को तैरनेवाले बनें।
Subject
बुद्धि के धनी का प्रभु में प्रवेश [ Crossing of three river ]
Footnote
सूचना - इस मन्त्र में 'अहन्, उषस् व दिव्' तीन शब्दों का प्रयोग अत्यन्त प्रसिद्ध अर्थ में न होकर अभिमान, काम व लोभ के लिए हुआ है।