Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 557

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सिकता निवावरी Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्रो꣡ अ꣢यासी꣣दि꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य निष्कृ꣣त꣢꣫ꣳ सखा꣣ स꣢ख्यु꣣र्न꣡ प्र मि꣢꣯नाति स꣣ङ्गि꣡र꣢म् । म꣡र्य꣢ इव युव꣣ति꣢भिः꣣ स꣡म꣢र्षति꣣ सो꣡मः꣢ क꣣ल꣡शे꣢ श꣣त꣡या꣢मना प꣣था꣢ ॥५५७॥

प्र꣢ । उ꣣ । अयासीत् । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । नि꣣ष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । स꣡ख्युः꣢꣯ । स । ख्युः꣢ । न꣢ । प्र । मि꣣नाति । सङ्गि꣡र꣢म् । स꣣म् । गि꣡र꣢꣯म् । म꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । युवति꣡भिः꣢ । सम् । अ꣣र्षति । सो꣡मः꣢꣯ । क꣣लशे꣢ । श꣣त꣡या꣢मना । श꣣त꣢ । या꣣मना । पथा꣢ ॥५५७॥

Mantra without Swara
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतꣳ सखा सख्युर्न प्र मिनाति सङ्गिरम् । मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयामना पथा ॥

प्र । उ । अयासीत् । इन्दुः । इन्द्रस्य । निष्कृतम् । निः । कृतम् । सखा । स । खा । सख्युः । स । ख्युः । न । प्र । मिनाति । सङ्गिरम् । सम् । गिरम् । मर्यः । इव । युवतिभिः । सम् । अर्षति । सोमः । कलशे । शतयामना । शत । यामना । पथा ॥५५७॥

Samveda - Mantra Number : 557
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘सिकता' शब्द ब्राह्मण ग्रन्थों में 'रेत:' का पर्याय है। यह ऋषि का अपने को शक्ति का पुञ्ज बनाती है और इसी उद्देश्य से निवावरी = निश्चय से प्रभु का वनन-उपासन-सम्भजन करती है। प्रभु उपासना से वासनाएँ दूर रहती हैं और शक्ति की रक्षा सम्भव होती है। यह इसी निश्चय पर पहुँची है कि १, (इन्दु:) = [ विन्दु:] शक्ति का धारण करके शक्ति का पुञ्ज बननेवाला व्यक्ति ही (उ) = निश्चय से (इन्द्रस्य) = प्रभु के (निष्कृतम्) = शुद्ध पद को अथवा अनृणता को (प्र आयासीत्) = प्रकर्षण प्राप्त होता है। २. (सखा) = यह प्रभु का मित्र (सख्युः) = अपने मित्र प्रभु की (सङ्गिरम्) = उत्तम वाणी को अथवा प्रभु के साथ की गई प्रतिज्ञा को (न प्रमिनाति) = नहीं तोड़ता है। सच्चा मित्र प्रतिज्ञा नहीं तोड़ता । ३. यह (मर्यइव) = उस मनुष्य की भाँति जोकि (युवतिभिः समर्षति) = युवतियों के साथ गति करता है और उनके साथ होने से उचित मर्यादित नम्रता [modesty ] से चलता है, उसी प्रकार (सोमः) = सोम व विनीत होता है तथा ४. (कलशे) = शरीररूप कलश में (शतयामन पथा) = शतश: नियन्त्रणोवाले, प्रतिदिन लिए जानेवाले अल्पव्रतो के नियमवाले मार्ग से चलता है। इसने कितने ही व्रतों में अपने को संयत किया हुआ होता है। यह संयम बन्धन ही तो इसके बन्धन-छेद का कारण बनता है। यह संयम ही इसके शरीर को भी १६ कला संपन्न बना 'कलश' इस सार्थक नामवाला करता है।
Essence
शक्ति का धारण, प्रभु से की गई प्रतिज्ञाओं का पालन, उचित विनीतता व व्रतमय जीवन ये चार बातें हमें परम- पद को प्राप्त कराने में साधन होती हैं।
Subject
सिकता निवावरी