Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 556

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ प्र कोशे꣣ म꣡धु꣢माꣳ अचिक्रद꣣दि꣡न्द्र꣢स्य꣣ व꣢ज्रो꣣ व꣡पु꣢षो꣣ व꣡पु꣢ष्टमः । अ꣣भ्यॄ꣢३त꣡स्य꣢ सु꣣दु꣡घा꣢ घृ꣣त꣡श्चुतो꣢ वा꣣श्रा꣡ अ꣢र्षन्ति꣣ प꣡य꣢सा च धे꣣न꣡वः꣢ ॥५५६॥

ए꣣षः꣢ । प्र । को꣡शे꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मान् । अ꣣चिक्रदत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । व꣡ज्रः꣢꣯ । व꣡पु꣢꣯षः । व꣡पु꣢꣯ष्टमः । अ꣣भि꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सु꣣दु꣡घाः꣢ । सु꣣ । दु꣡घाः꣢꣯ । घृ꣣तश्चु꣡तः꣢ । घृ꣣त । श्चु꣡तः꣢꣯ । वा꣣श्राः꣢ । अ꣣र्षन्ति । प꣡य꣢꣯सा । च꣣ । धेन꣡वः꣢ ॥५५६॥

Mantra without Swara
एष प्र कोशे मधुमाꣳ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टमः । अभ्यॄ३तस्य सुदुघा घृतश्चुतो वाश्रा अर्षन्ति पयसा च धेनवः ॥

एषः । प्र । कोशे । मधुमान् । अचिक्रदत् । इन्द्रस्य । वज्रः । वपुषः । वपुष्टमः । अभि । ऋतस्य । सुदुघाः । सु । दुघाः । घृतश्चुतः । घृत । श्चुतः । वाश्राः । अर्षन्ति । पयसा । च । धेनवः ॥५५६॥

Samveda - Mantra Number : 556
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (एषः) = यह कवि प्र-कोशे - सर्वोत्कृष्ट आनन्दमयकोश में निवास करता हुआ (मधुमान्) = माधुर्यवाला होता है। यह मधु जैसा ही हो जाता है। अन्नमयादि कोश ही तो हमें द्वैत में रखते हैं। आनन्दमयकोश में पहुँचकर यह एकत्व का दर्शन करता है और शोक-मोह से ऊपर उठकर किसी से भी यह घृणा नहीं करता [ततो न विजु गुप्सते ] ।

२. (अचिक्रदत्) = यह प्राणिमात्र के कल्याण के लिए सदा प्रभु का आह्वान करता [Send his constant prayers unto God] [क्रद्+यङ् का लुङ्] । इसका जीवन प्रार्थनामय होता है, अतएव वासनाशून्य | वासनाओं को तो मानो यह रुला देता है कि हम कहाँ रहेंगी? इसी का परिणाम है कि

३. (इन्द्रस्य वज्रः) = यह इन्द्र बनता है। जितेन्द्रिय - इन्द्रियों का अधिष्ठाता। इसका शरीर वज्रतुल्य दृढ़ हो जाता है। यह तो हुआ कवि का निजु जीवन। इसके सामाजिक जीवन में (वाश्राः अभी अर्षन्ति) = इसकी आवाजें [उपदेश वाणियाँ] चारों ओर तीव्रता से पहुँचती हैं [अर्ष=rush]। यह परिव्राट जो हुआ। कैसी वाणियाँ? [क] (ऋतस्य) = सत्य की। यह असत्य को कभी बोलता ही नहीं है, [ख] (सुदुघा) = उत्तमता से पूरण करनेवाली । इसकी वाणी जले पर नमक छिड़कनेवाली न होकर घावों को भरनेवाली होती हैं, [ग] (घृतश्चुत:) = दीप्ति का स्रावण करनेवाली अर्थात् उत्साह भरनेवाली अथवा ज्ञान देनेवाली, और [घ] (पयसा) = वृद्धि के द्वारा (धेनवः) = पान करानेवाली - तृप्त करानेवाली। इसकी वाणियाँ वृद्धि का ही कारण बनती हैं, ह्रास का नहीं। यह धर्म का प्रचार अत्यन्त श्लक्ष्ण व मधुर वाणी से करता है। 
Essence
कवि सदा आनन्दमयकोश में निवास करता है और मधुर शब्दों को ही बोलता है।
Subject
कवि का निवासस्थान व कार्यप्रणाली