Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 546

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नहुषो मानवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣यं꣢ पू꣣षा꣢ र꣣यि꣢꣫र्भगः꣣ सो꣡मः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣢र्षति । प꣡ति꣣र्वि꣡श्व꣢स्य꣣ भू꣡म꣢नो꣣꣬ व्य꣢꣯ख्य꣣द्रो꣡द꣢सी उ꣣भे꣢ ॥५४६॥

अ꣣य꣢म् । पू꣣षा꣢ । र꣣यिः꣢ । भ꣡गः꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣र्षति । प꣡तिः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । भू꣡म꣢꣯नः । वि । अ꣣ख्यत् । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ ॥५४६॥

Mantra without Swara
अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अर्षति । पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे ॥

अयम् । पूषा । रयिः । भगः । सोमः । पुनानः । अर्षति । पतिः । विश्वस्य । भूमनः । वि । अख्यत् । रोदसीइति । उभेइति ॥५४६॥

Samveda - Mantra Number : 546
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'नहुष मानव' है। मननपूर्वक प्रत्येक कर्म को करनेवाला यह [नह् बन्धने] औरों के साथ अपने जीवन को सम्बद्ध करके चलता है। अपनी ही मौज में मस्त न होकर यह औरों के साथ सहानुभूति रखता है उनके दुःख में दुःखी होता है, सुख में सुखी। इसका जीवन भोग-प्रवण न होने से ही (अर्यम्) = यह (पूषा) = अपने स्थूल शरीर को ठीक पुष्ट रख पाता है—इसका शरीर दुर्बल नहीं होता। भोग ही तो रोगों व क्षीणता के कारण होते हैं—और उनसे यह दूर ही है। इसका प्राणमयकोश (रयिः भगः) = चान्द्रमस तत्त्व व सौर तत्त्व की शक्तिवाला होता है। ‘रयि' चन्द्रमा है, ‘भग' सूर्य है, सूर्य प्रजाओं का प्राण है, प्राण के स्थान में भग का प्रयोग ठीक ही है। इन दोनों तत्त्वों के समन्वय पर ही स्वास्थ्य का पूर्ण निर्भर है। शरीर का विकास व दोषों का दूरीकरण व नैर्मल्य का परिणाम यह होता है कि यह (सोमः) = सौम्यता को धारण करता है - अभिमान से शुन्य होता है और अपने मनोमय कोश को (पुनान:) = पवित्र करता हुआ (अर्षति) = [ऋष् गतौ] ऋषि बनता है - तत्त्व द्रष्टा होता है। इस तत्त्वज्ञान को प्राप्त करने के उपरान्त यह (विश्वस्य) = सब (भूमन:) = [यौ वै भूमा तत्सुखम् ] सुख का (पति:) = पति होता है। विज्ञानमयकोश में ज्ञान की दीप्ति के उपरान्त ही आनन्दमयकोश में सुखानुभव होता है।

इस प्रकार अपने पञ्चकोशों का ठीक विकास करता हुआ यह 'नहुष' (उभे रोदसी)= दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक को (व्यख्यत्) = प्रकाशित करता है। इसके यश का प्रकाश सर्वत्र फैलता है, इतना ही नहीं, यह सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। ज्ञान के प्रकाश द्वारा अन्धकार को दूर कर सभी के जीवनों को सुखी व उन्नत बनाने का प्रयत्न करता है। 
Essence
 हम अपने जीवनों को सुन्दर बनाकर औरों के मंगल में प्रवृत्त हों।
Subject
नहुष - मानव [ मिलनसार मनुष्य ]