Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 545

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अन्धीगुः श्यावाश्विः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳश्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥५४५॥

पु꣣रो꣡जि꣢ती । पु꣣रः꣢ । जि꣣ती । वः । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣ता꣡य꣢ । मा꣣दयित्न꣡वे꣢ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । श्न꣣थिष्टन । श्नथिष्ट । न । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । दीर्घजिह्व्य꣢꣯म् । दी꣣र्घ । जिह्व्य꣢꣯म् । ॥५४५॥

Mantra without Swara
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे । अप श्वानꣳश्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम् ॥

पुरोजिती । पुरः । जिती । वः । अन्धसः । सुताय । मादयित्नवे । अप । श्वानम् । श्नथिष्टन । श्नथिष्ट । न । सखायः । स । खायः । दीर्घजिह्व्यम् । दीर्घ । जिह्व्यम् । ॥५४५॥

Samveda - Mantra Number : 545
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'अन्धीगुः श्यावाशिवः' है। अन्ध उस संन्यासी को कहते हैं जिसने कि इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश में किया है। 'अन्धस्य गावो यस्य' उस साधु की भाँति है ज्ञानेन्द्रियाँ जिसकी ऐसा यह व्यक्ति 'अन्धीगुः' है। 'अन्धीगुः बनने के लिए ही वस्तुतः इसने [श्यैङ्तौ] सदा कर्मेन्द्रियों को कर्मव्याप्त रक्खा है । यह अन्धीगु (अन्धसः) = आध्यायनीय सोम
के (पुरोजिती) = [जित्या] पूर्ण विजय के हेतु से कहता है कि हे (सखायः) = मित्र! (वः) =तुम्हारे (दीर्घजिह्वयम्) = दीर्घ जिह्वावाले (श्वानम्) = कुत्ते को (अपश्नथिष्टन्) = अपने से दूर हिंसित कर दो। (‘जहि श्वयातुम्') = मन्त्रभाग में भी यही कहा गया है कि कुत्ते के मार्ग को छोड़ दो। कुत्ता जिह्वालौल्य का प्रतीक है - वह टुकड़े को अपने सजातीय से छीनने के लिए लड़ता है। वान्त= = कै का भी अशन कर जाता है। इस जिह्वा के असंयम का परिणाम उपस्थ का असंयम है। जिह्वा के रस में फँसा हुआ व्यक्ति कभी भी सोम का पूर्ण संयम नहीं कर सकता।

पर प्रश्न तो यह है कि इस सोम के संयम की आवश्यकता ही क्या है? इसका उत्तर
देते हुए कहते हैं कि १. (सुताय) = उत्पादन के लिए सोम का संयम आवश्यक है। संयमी पुरुष ही कुछ निर्माण का कार्य कर सकते हैं । २. (मादयित्नवे) = प्रसन्न बनाने के लिए यह संयत सोम साधक बनता है। संयमी पुरुष का जीवन उल्लासमय होता है - वह कभी मुरझाए हुए चेहरेवाला नहीं दिखता। एवं 'हमारा जीवन सदा उल्लासमय हो' और 'हम कुछ-न-कुछ निर्माणात्मक कार्य कर पाएँ' इन दोनों बातों के लिए संयम की आवश्यकता है और उस संयम के लिए जिह्वारस को कुचलना आवश्यक है। जिह्वारस से बचेंगे और कर्म में लगे रहेंगे तो ज्ञानेन्द्रियों पर अवश्य प्रभुत्व पा पाएँगे। यह पाँचो ज्ञानेन्द्रियों को अवस्थित करनेवाला' व्यक्ति ही अन्धीगु है ।
Essence
मैं जिह्वा का संयम साधूँ।
Subject
जिह्वा - रस से दूर