Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 534

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ ते꣣ धा꣢रा꣣ म꣡धु꣢मतीरसृग्र꣣न्वा꣢रं꣣ य꣢त्पू꣣तो꣢ अ꣣त्ये꣡ष्यव्य꣢꣯म् । प꣡व꣢मान꣣ प꣡व꣢से꣣ धा꣡म꣢ गो꣡नां꣢ ज꣣न꣢य꣣न्त्सू꣡र्य꣢मपिन्वो अ꣣र्कैः꣢ ॥५३४॥

प्र꣢ । ते꣣ । धा꣡राः꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मतीः । अ꣣सृग्रन् । वा꣡र꣢꣯म् । यत् । पू꣣तः꣢ । अ꣣त्ये꣡षि꣢ । अ꣣ति । ए꣡षि꣢꣯ । अ꣡व्य꣢꣯म् । प꣡व꣢꣯मान । प꣡व꣢꣯से । धा꣡म꣢꣯ । गो꣡ना꣢꣯म् । ज꣣न꣡य꣢न् । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣पिन्वः । अर्कैः꣢ ॥५३४॥

Mantra without Swara
प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारं यत्पूतो अत्येष्यव्यम् । पवमान पवसे धाम गोनां जनयन्त्सूर्यमपिन्वो अर्कैः ॥

प्र । ते । धाराः । मधुमतीः । असृग्रन् । वारम् । यत् । पूतः । अत्येषि । अति । एषि । अव्यम् । पवमान । पवसे । धाम । गोनाम् । जनयन् । सूर्यम् । अपिन्वः । अर्कैः ॥५३४॥

Samveda - Mantra Number : 534
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'पराशर शाक्त्य' है - शत्रु को नष्ट करनेवाला शक्तिसम्पन्न। यह काम-क्रोधादि को नष्ट करने में तत्पर है। (अव्यम्) = रक्षण करनेवालों में सर्वोत्तम जो 'ज्ञान' है, उस ज्ञान के (वारम्) = विघ्नभूत काम को यह पराशर नष्ट करने के लिए सतत प्रयत्न में लगा है। काम ज्ञान का शत्रु है - और ज्ञान काम का विध्वंश करनेवाला। ज्ञान-जल कामाग्नि को उसी प्रकार बुझा देता है जैसे प्रचण्ड सूर्य की किरणें बादल को छिन्न-भिन्न कर देती हैं। प्रभु इस पराशर से कहते हैं कि (यत्) = जब (अव्यं वारम्) = इस सर्वोत्त्म रक्षक ज्ञान के विघ्नभूत [वृ=वृत्र, वार] काम को (पूतः) = ज्ञान से पवित्र हुआ हुआ तू [नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमहि विद्यते] (अत्येषि) = लाँघ जाता है, तो (ते) = तेरी (मधुमती: धारा असृग्रन्) = योग की अन्तिम भूमिका में उत्पन्न होनेवाली आनन्दरस के माधुर्य की स्त्रविणी धाराएँ उत्पन्न होती हैं। यह आनन्द की वर्षा तुझे इस मार्ग में और स्थिर होने की प्रेरणा देती है।

पराशर नम्रतापूर्वक प्रभु से कहता है कि हे प्रभो! (पवमान) = आप ही तो मुझे पवित्र करनेवाले हो। १. (गानां धाम पवसे) = मेरी इन्द्रियों के तेज को प्राप्त कराते हैं या उसे तेजस्वी बनाते हैं, २. (सूर्यं जनयन्) = आप ही मुझमें ज्ञान - सूर्य का उदय करनेवाले हैं। आपकी कृपा से ही मेरा ज्ञान सूर्य की भाँति चमकता है - मेरे मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान का सूर्य आपके द्वारा ही तो उदित किया जा रहा है और ३. हे प्रभो आप ही मेरे हृदय को (अर्कैः) = स्तुति मन्त्रों से—स्तोमों से–भक्ति की भावनाओं से (अपिन्वः) = भर रहे हैं- पूरित कर रहे हैं। मेरे शरीर को तेजस्विता, मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि की प्रचण्डता तथा हृदय में भक्ति की भावनाएँ सब आपसे ही तो पैदा की जा रही हैं। यह अत्यन्त विनीत पराशर प्रभु की गोद में क्यों न पहुँचेगा।
Essence
मैं काम का संहार कर, प्रभुकृपा से इस अध्यात्म युद्ध का विजेता बनूँ। प्रभु सेनानी हों और मैं हार जाऊँ? यह कैसे हो सकता है?
Subject
अध्यात्म संग्राम में विजय