Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 531

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशना काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣ष꣢꣫ स्य ते꣣ म꣡धु꣢माꣳ इन्द्र꣣ सो꣢मो꣣ वृ꣢षा꣣ वृ꣢ष्णः꣣ प꣡रि꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अक्षाः । स꣣हस्रदाः꣡ श꣢त꣣दा꣡ भू꣢रि꣣दा꣡वा꣢ शश्वत्त꣣मं꣢ ब꣣र्हि꣢꣫रा वा꣣꣬ज्य꣢꣯स्थात् ॥५३१॥

ए꣣षः꣢ । स्यः । ते꣣ । म꣡धु꣢꣯मान् । इ꣣न्द्र । सो꣡मः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । वृ꣡ष्णः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣हस्रदाः꣢ । स꣣हस्र । दाः꣢ । श꣣तदाः꣢ । श꣣त । दाः꣢ । भू꣣रिदा꣡वा꣢ । भू꣣रि । दा꣡वा꣢꣯ । श꣣श्वत्तम꣢म् । ब꣣र्हिः꣢ । आ । वा꣣जी꣢ । अ꣣स्थात् ॥५३१॥

Mantra without Swara
एष स्य ते मधुमाꣳ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णः परि पवित्रे अक्षाः । सहस्रदाः शतदा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात् ॥

एषः । स्यः । ते । मधुमान् । इन्द्र । सोमः । वृषा । वृष्णः । परि । पवित्रे । अक्षारिति । सहस्रदाः । सहस्र । दाः । शतदाः । शत । दाः । भूरिदावा । भूरि । दावा । शश्वत्तमम् । बर्हिः । आ । वाजी । अस्थात् ॥५३१॥

Samveda - Mantra Number : 531
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(एषः) = यह (स्यः) = समीप से समीप, दूर से दूर वर्तमान (सोम:) = प्रभु हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव! १. (मधुमान्) = रसमय है। प्रभु को अपनाने पर तेरा जीवन रसमय होगा। अफ्रुत आनन्द प्राप्त होगा जो वाणी का विषय नहीं है। 'एतत्' शब्द समीप का और 'तत' दूर का वाचक है। वे प्रभु सर्वत्र हैं, अधिक-से-अधिक दूर और अधिक-से-अधिक समीप। (वृषा) = वे प्रभु शक्तिशाली हैं, हमें सब कोशों में शक्तिशाली बनानेवाले हैं और (वृष्णः) = शक्तिशाली पुरुष के (पवित्रे) - पवित्र हृदय में (परि अक्षाः) = वे प्रभु व्याप्त होते हैं। शक्ति मनुष्य को पवित्र बनाती है - पवित्र हृदय प्रभु का निवासस्थान होता है।

अपने हृदय को पवित्र बनाकर मैं उस प्रभु का निवास स्थान बनाता हूँ तो वे प्रभु ३. (सहस्रदा:) = [स+हस्+दा] मुझे आनन्दमय जीवन प्राप्त कराते हैं, ४. (शतदा:) = पूरे सौ वर्ष का दीर्घ जीवन देते हैं और ५. (भूरिदावा) = आशा से भी अधिक धन [भूरि=more] प्राप्त करानेवाले हैं। संक्षेपत: उपासना से आनन्द, दीर्घजीवन व ऐश्वर्य-सभी उपलब्ध होते हैं। उपासना के लाभ देखकर कौन उस प्रभु का उपासक न बनेगा? 'काव्य'=क्रान्तदर्शी- ऐसे तत्तव देखनेवाला व्यक्ति तो उस प्रभु की अवश्य कामना करेगा। ऐसी कामना करनेवाला यह 'उशनाः'–कहलाता है। यह कहता है कि (आवाजी) = मुझे प्रत्येक कोश में शक्ति देनेवाला वह प्रभु (शश्वत्तमम्) = सदा (बर्हिः) = मेरे पवित्र हृदय में, जिसमें से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है, (अस्थात्) = ठहरे–विराजमान हो। मै प्रभु के सामीप्य से सामीप्य मुक्ति का आनन्द तो अनुभव करूँ ही । 
Essence
 वे प्रभु मेरे जीवन को रसमय कर देते हैं। मैं उन्हीं की कामना करनेवाला उशना बनूँ।
Subject
पवित्र हृदय में प्रभु