Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 53

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
का꣡य꣢मानो व꣣ना꣢꣫ त्वं यन्मा꣣तॄ꣡रज꣢꣯गन्न꣣पः꣢ । न꣡ तत्ते꣢꣯ अग्ने प्र꣣मृ꣡षे꣢ नि꣣व꣡र्त꣢नं꣣ य꣢द्दू꣣रे꣢꣫ सन्नि꣣हा꣡भुवः꣢ ॥५३॥

का꣡य꣢꣯मानः । व꣣ना꣢ । त्वम् । यत् । मा꣣तॄः꣢ । अ꣡ज꣢꣯गन् । अ꣣पः꣢ । न । तत् । ते꣣ । अग्ने । प्रमृ꣡षे꣢ । प्र꣣ । मृ꣡षे꣢꣯ । नि꣣ । व꣡र्त्त꣢꣯नम् । यत् । दू꣣रे꣢ । दुः꣣ । ए꣢ । सन् । इ꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः ॥५३॥

Mantra without Swara
कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः । न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभुवः ॥

कायमानः । वना । त्वम् । यत् । मातॄः । अजगन् । अपः । न । तत् । ते । अग्ने । प्रमृषे । प्र । मृषे । नि । वर्त्तनम् । यत् । दूरे । दुः । ए । सन् । इह । अभुवः ॥५३॥

Samveda - Mantra Number : 53
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु कहते हैं कि (अग्ने) = हे आगे बढ़नेवाले जीव! (त्वम्) = तू (वना) = उपासना तथा प्रकाश की किरणों अर्थात् ज्ञान [Worshipping, Ray of light] को (कायमान:)=[कामयमानः] चाहता हुआ (यत्) = जो (मातृः) = धन का निर्माण करनेवाले [मा] और धन में आसक्त करके उपासना व ज्ञान से दूर ले जानेवाले अतएव हिंसक (अपः) = कर्मों को (अजगन्) = प्राप्त हुआ है, (ते) =तेरे (तत्)=उस (निवर्तनम्) = फिर लौट पड़ने को (न)= नहीं (प्रमृषे) = क्षमा करता हूँ, अच्छा नहीं समझता हूँ।

धन का एक अच्छा पहलू भी है। धन की उपयोगिता विवादास्पद नहीं, परन्तु इसके काले पहलू में एक बात यह भी है कि यह मनुष्य को लोभाभिभूत कर देता है। यह आध्यात्मिक उन्नति के लिए विघातक व अनावश्यक है। उपासना व ज्ञान की ओर चलकर, माया से आकृष्ट हो फिर धनार्जन के कामों में उलझ जाना, यह फिर लौट पड़ना अवनति का कर्म है, अतः त्याज्य है। प्रभु जीव से कहते हैं कि हे जीव ! यह जो दूरे सन् - बहुत दूर आगे बढ़ा हुआ होकर (इह आभुवः) = फिर वहीं काम्य कर्मों में रह गया, यह ठीक नहीं।

जिस प्रकार गृहस्थ आश्रम बड़ा सुन्दर है। ब्रह्मचर्य के बाद एक व्यक्ति गृहस्थ में प्रवेश करता है तो सभी उसका सम्मान करते हैं, परन्तु वह गृहस्थ के बाद वनस्थ हो, संन्यासी बन फिर गृहस्थ में लौट पड़े तो अखरता है, ठीक नहीं लगता।

काम्य कर्मों से ऊपर उठकर फिर उन्हीं में उलझना ठीक नहीं । काम्य कर्मों से ऊपर पड़ना। उठ, राग-द्वेष से परे पहुँचकर हम इस मन्त्र के ऋषि ‘विश्वामित्र' बनेंगे।
Essence
मानव जीवन का सूत्र आगे बढ़ना है, न कि पिछड़ जाना- नीचे की ओर लौट पड़ना|
Subject
आगे जाकर लौट पड़ना ठीक नहीं