Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 524

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृषगणो वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ काव्य꣢꣯मु꣣श꣡ने꣢व ब्रुवा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ज꣡नि꣢मा विवक्ति । म꣡हि꣢व्रतः꣣ शु꣡चि꣢बन्धुः पाव꣣कः꣢ प꣣दा꣡ व꣢रा꣣हो꣢ अ꣣꣬भ्ये꣢꣯ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥५२४॥

प्र꣢ । का꣡व्य꣢꣯म् । उ꣣श꣡ना꣢ । इ꣣व । ब्रुवाणः꣢ । दे꣣वः꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । ज꣡नि꣢꣯म । वि꣣वक्ति । म꣡हि꣢꣯व्रतः । म꣡हि꣢꣯ । व्र꣣तः । शु꣡चि꣢꣯बन्धुः । शु꣡चि꣢꣯ । ब꣣न्धुः । पावकः꣢ । प꣣दा꣢ । व꣣राहः꣢ । अ꣣भि꣢ । ए꣣ति । रे꣡भ꣢꣯न् ॥५२४॥

Mantra without Swara
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति । महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन् ॥

प्र । काव्यम् । उशना । इव । ब्रुवाणः । देवः । देवानाम् । जनिम । विवक्ति । महिव्रतः । महि । व्रतः । शुचिबन्धुः । शुचि । बन्धुः । पावकः । पदा । वराहः । अभि । एति । रेभन् ॥५२४॥

Samveda - Mantra Number : 524
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'वृषगणो वासिष्ठ' है- [वृष= धर्म] जिसका जीवन धर्ममय है, इतना धर्ममय कि मानो धर्म ही शरीरब हो गया है - वह धर्म का पुञ्ज है। धर्मात्माओं में विशेषरूप से उसकी गिनती होती है। वह उत्तम वशी है - अथवा शरीर में सर्वोत्तम निवास करनेवाला है। इस व्यक्ति के जीवन में हम निम्न बातें देखते हैं -

१.( उशना इव काव्यं प्रब्रवाणः) = रुचिपूर्वक प्रभु के अजरामर काव्य - वेद का उच्चारण करता है। मनुष्यकृत काव्य समय पाकर मध्यम दीप्तिवाले हो जाते हैं। यह वेदरूप काव्य अजरामर है – इसकी दीप्ति शाश्वत है। धर्म के ज्ञान का यही स्रोत है। वेद में जिसकी प्रेरणा दी गई है वही तो धर्म है (चोदना लक्षणो धर्मः) । यह धार्मिक जीवनवाला व्यक्ति वेद के पाठन को अपना प्रथम धर्म समझता है ।

२. (देवः) = वेद का स्वाध्याय उसके जीवन में पवित्रता लाता है। अपने जीवन में दिव्य गुणों को बढ़ाता हुआ यह 'देव' बन जाता है।

३. (देवानाम्) = सूर्यादि ३३ देवों के सभी प्राकृतिक पदार्थों के (जनिमा) = प्रादुर्भाव व विकास को (विवक्ति) = यह विशेषरूप से उच्चारित करता है। इन पदार्थों के विकास में यह उस निर्माता प्रभु की महिमा देखता है। यह विज्ञान उसे प्रभु की सत्ता में दृढ़ विश्वासी बनानेवाला होता है।

४. (महिव्रतः) =यह अपने जीवन में किसी न किसी महान् व्रत को लेकर चलता है। व्रती जीवन ही वस्तुतः धर्ममय जीवन हुआ करता है। बिना व्रतग्रहण के हम कभी धार्मिक नहीं बन सकते।

५. (शुचिबन्धुः) = यह पवित्र धनवाला होता है । [ बन्धु = धनम् नि० २-१०-२१] सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक धर्म 'शुचि बन्धुत्व' ही है। यजुर्वेद में अन्तिम निर्देश 'नय सुपथा राये' ही है - धन को उत्तम मार्ग से कमाना। मनु ने इसी को सुचिता माना है- ('योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिः न मृद्वारि शुचिः शुचिः) |

‘शुचिबन्धु' शब्द का अर्थ पवित्र मित्रोंवाला भी है। वस्तुतः जीवन के निर्माण में मित्रों का बड़ा हाथ होता है। अच्छे मित्र जीवन को अच्छा बना देते हैं और बुरे बुरा । 
६. (पावकः) = यह जिनके भी सम्पर्क में आता है, उनके जीवन को पवित्र बना डालता है। अग्नि में सोना निखर उठता है, इसके सम्पर्क में आकर लोगों का जीवन पवित्र हो जाता है।

७. (पदा वराहः) = गतिशीलता के द्वारा यह सुन्दर दिनवाला [वर+अहन्] होता है। 'सुदिनत्वमह्णाम्' दिन की भद्रता जीवन का कितना श्रेष्ठ द्रविण है। 

८. यह (रेभन्) = स्तुति करता हुआ (अभ्येति) = उस प्रभु की ओर चलता है। सदा प्रभु के स्मरण से इसके सामने लक्ष्य दृष्टि बनी रहती है, अतः यह मार्ग से विचलित न होकर प्रभुरूप लक्ष्य की ओर बढ़ता चलता है।
 
Essence
वेदाध्ययन को प्राथमिक धर्म बनाकर मैं अपने जीवन को धर्म-प्रधान बनाऊँ।
Subject
धार्मिक जीवन