Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 522

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢माना असृक्षत प꣣वि꣢त्र꣣म꣢ति꣣ धा꣡र꣢या । म꣣रु꣡त्व꣢न्तो मत्स꣣रा꣡ इ꣢न्द्रि꣣या꣡ हया꣢꣯ मे꣣धा꣢म꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि च ॥५२२॥

प꣡वमा꣢꣯नाः । अ꣣सृक्षत । पवि꣡त्र꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । धा꣡र꣢꣯या । म꣣रु꣡त्व꣢न्तः । म꣣त्सराः꣢ । इ꣣न्द्रियाः꣢ । ह꣡याः꣢꣯ । मे꣣धा꣢म् । अ꣣भि꣢ । प्र꣡याँ꣢꣯सि । च꣣ ॥५२२॥

Mantra without Swara
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया । मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधामभि प्रयाꣳसि च ॥

पवमानाः । असृक्षत । पवित्रम् । अति । धारया । मरुत्वन्तः । मत्सराः । इन्द्रियाः । हयाः । मेधाम् । अभि । प्रयाँसि । च ॥५२२॥

Samveda - Mantra Number : 522
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(धारया) = धारण के उद्देश्य से [ हेतु में तृतीया] इसलिए कि सोम हमारे शरीर में ही संयत रहे, उसका नाश न हो, ये (पवमाना:) = पवित्र करनेवाले सोम (अतिपवित्रं असृक्षत) = बहुत पवित्र बनाए गये हैं। वासना जनित उष्णता ही इन्हें अपवित्र करती है। इससे इन्हें शून्य रखने का प्रयत्न किया गया है। यदि सचमुच हम इन पवमानों को पवित्र बनाये रखें तो ये १. (मरुत्वन्तः) = हमारी प्राणशक्ति को बढ़ानेवाले होते हैं – ये हमें प्रशस्त प्राणोंवाला बनाते हैं। २. (मत्सरा:) = ये हमारे अन्दर उल्लास को जन्म देते हैं। हमारा जीवन एक विशेष मस्तीवाला होता है। ३. (इन्द्रिया) = ये सोम हमारी एक-एक इन्द्रिय को शक्ति सम्पन्न बनाते हैं [इन्द्रियं = बलम्] ४. (हया:) = [हय गतौ] सोम के संयम से हमारी गतिशीलता बढ़ती है, हम स्फूर्ति- सम्पन्न होते हैं। ५. (मेधाम अभि) = ये सोम हमें मेधाबुद्धि की ओर ले चलते हैं (च) और ६. (प्रयांसि अभि) = इनके द्वारा हम इस योग्य बनते हैं कि 'काम-क्रोध-लोभ' का नियमन कर सकें। ‘नियन्त्रित काम-क्रोध-लोभ' हमारे उत्थान का कारण होंगे। नियन्त्रित काम से ही वेदाधिगम व यज्ञादि कार्य हुआ करते हैं। नियन्त्रित क्रोध से हमें पाप के प्रति घृणा होती है और नियन्त्रित लोभ हमें सद्गुणों के अर्जन में कभी सन्तुष्ट होकर रुकने नहीं देता। 
Essence
मैं सोम को सदा पवित्र रखूँ, जिससे सोम मुझे पवित्र बनानेवाला हो।
Subject
पवित्रता