Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 515

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡म꣢ उ ष्वा꣣णः꣢ सो꣣तृ꣢भि꣣र꣢धि꣣ ष्णु꣢भि꣣र꣡वी꣢नाम् । अ꣡श्व꣢येव ह꣣रि꣡ता꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या म꣣न्द्र꣡या꣢ याति꣣ धा꣡र꣢या ॥५१५॥

सो꣡मः꣢꣯ । उ꣣ । स्वानः꣢ । सो꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । स्नु꣡भिः꣢꣯ । अ꣡वी꣢꣯नाम् । अ꣡श्व꣢꣯या । इ꣣व꣢ । हरि꣡ता꣢ । या꣣ति । धा꣡र꣢꣯या । म꣣न्द्र꣡या꣢ । या꣣ति । धा꣡र꣢꣯या ॥५१५॥

Mantra without Swara
सोम उ ष्वाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम् । अश्वयेव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया ॥

सोमः । उ । स्वानः । सोतृभिः । अधि । स्नुभिः । अवीनाम् । अश्वया । इव । हरिता । याति । धारया । मन्द्रया । याति । धारया ॥५१५॥

Samveda - Mantra Number : 515
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम)=सोम तू (देववीतये) = दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए होता है [वीतिं = प्राप्ति]। (प्र) = अपने इस कार्य को तू प्रकर्ष के साथ करता है। तेरे संयम का परिणाम होता है कि संयमी पुरुष दिव्य गुणों से इस प्रकार (पिप्ये) = आप्यायित हो जाता है (न) = जैसे (सिन्धुः) = समुद्र (अर्णसा) = जल से। जैसे समुद्र जल से भरता चलता है, उसी प्रकार संयमी पुरुष दिव्यगुणों से पूर्ण होता जाता है। दिव्यता को भरता हुआ यह सोम धीरे-धीरे मनुष्य को देव ही बना डालता है। जीव महादेव का ही छोटा रूप बन जाता है - अंश [miniature] हो जाता है। इसी कारण सोम को अंशु=अंश बनानेवाला कहा गया है। (अंशोः) = इस सोम की (पयसा) = [पय गतौ] शरीर में सर्वत्र गति से (मदिरो न)= मनुष्य मदिर-सा [उन्मत्त-सा] हो जाता है। उसके जीवन में ऐसा उल्लास होता है कि सामान्य मनुष्य उसे स्वस्थ नहीं समझता। यह संयमी (जागृविः) = जागरित होता है। दुनिया सोई हैहे - पर यह जागता है। 'मैं कौन हूँ?, यहाँ क्यों आया हूँ? मुझे कहाँ जाना है?' इत्यादि प्रश्न सामान्य मनुष्य के अन्दर उत्पन्न ही नहीं होते। इस संयमी के सामने ये प्रश्न सदा रहते हैं। यह उनको कभी भूलता नहीं, परिणामतः अपने को भी नहीं भूलता। यह योगी तो निरन्तर (मधुश्चुतं कोशम्) = मधु को टपकानेवाले - आनन्दमयकोश की अच्छा-ओर चला आ रहा है। सामान्य लोगों की बहिर्मुख यात्रा है, इसकी यात्रा अन्तर्मुख हैं लोग बाहर जा रहे हैं—यह अन्दर जा रहा है। लोग विषयों की ओर तो ये विषयों से दूर आत्मा की ओर क्योंकि विषयों में अशान्ति है, आत्मा में शान्ति।
Essence
सोम के संयम से मुझमें दिव्यगुण उत्पन्न हों, मैं मदिर व जागृवि बनूँ, आनन्दमयकोश की ओर चलूँ।
Subject
आनन्दमयकोश की ओर