Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 509

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अयास्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ न꣢ इन्दो म꣣हे꣡ तु न꣢꣯ ऊ꣣र्मिं꣡ न बिभ्र꣢꣯दर्षसि । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣢ꣳ अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

प्र꣢ । नः꣣ । इन्दो । महे꣢ । तु । नः꣣ । ऊर्मि꣢म् । न । बि꣡भ्र꣢꣯त् । अ꣣र्षसि । अभि꣢ । दे꣣वा꣢न् । अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

Mantra without Swara
प्र न इन्दो महे तु न ऊर्मिं न बिभ्रदर्षसि । अभि देवाꣳ अयास्यः ॥

प्र । नः । इन्दो । महे । तु । नः । ऊर्मिम् । न । बिभ्रत् । अर्षसि । अभि । देवान् । अयास्यः ॥५०९॥

Samveda - Mantra Number : 509
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम! तू (नः) = हमारे (महे तुने) महनीय - प्रशंसनीय ज्ञानरूप धन के लिए (ऊर्मि न बिभ्रत्) = हृदय में तरङ्ग - सी धारण करता हुआ (प्र अर्षसि) = खूब गतिशील होता है। सोम के धारण से हृदय में गम्भीर ज्ञान के लिए उसी प्रकार उत्साह होता है जैसाकि समुद्र में तरङ्गे उठती हैं।

ज्ञान-प्राप्ति के अतिरिक्त यह सोम हमें निरन्तर (देवां अभि) = दिव्य गुणों की ओर ले-चलता है। इससे हमारे अन्दर दैवी सम्पत्ति की वृद्धि होती है।

यह (अयास्यः) = अनथक होता है। संयमी पुरुष कभी थकता नहीं। उसके शरीर में शक्ति होती है जो उसे निरन्तर कार्य करने में समर्थ बनाती है।

सोम का मस्तिष्क पर परिणाम गम्भीर ज्ञान के लिए सामर्थ्य है, हृदय में दैवी गुणों का विकास है, तथा शरीर को यह अनथक काम करने के योग्य बनाता है। मन्त्र का ऋषि ही ‘अयास्य-आङ्गिरस' है-न थकनेवाला शक्तिशाली पुरुष। 
Essence
सोम मुझे अयास्य बनाए ।
Subject
अनथक