Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 507

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣡ सो꣢म सु꣣कृत्य꣡या꣢ म꣣हा꣢꣫न्त्सन्न꣣꣬भ्य꣢꣯वर्धथाः । म꣣न्दान꣡ इद्वृ꣢꣯षायसे ॥५०७॥

अ꣣या꣢ । सो꣣म । सुकृत्य꣡या꣢ । सु꣣ । कृत्य꣡या꣢ । म꣣हा꣢न् । सन् । अ꣣भि꣢ । अ꣣वर्धथाः । मन्दानः꣢ । इत् । वृ꣣षायसे ॥५०७॥

Mantra without Swara
अया सोम सुकृत्यया महान्त्सन्नभ्यवर्धथाः । मन्दान इद्वृषायसे ॥

अया । सोम । सुकृत्यया । सु । कृत्यया । महान् । सन् । अभि । अवर्धथाः । मन्दानः । इत् । वृषायसे ॥५०७॥

Samveda - Mantra Number : 507
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र का ‘काश्यप' यहाँ 'कवि' है - यह क्रान्तदर्शी है, भार्गव है- तपस्या से अपना परिपाक करनेवाला है। यह सोम से कहता है कि हे (सोम) = सोम! तू (अया) = इस (सुकृत्यया) = उत्तम कर्म के द्वारा–मेरे जीवन को उल्लासमय, शक्तिशाली व दिव्य गुणयुक्त बनाने के द्वारा महान् (सन्) = [मह पूजायाम्] मुझे पूजाप्रवण बनाता हुआ (अभि अवर्धथा:) = सब दृष्टिकोणों से बढ़ाता है। संयमी पुरुष का जीवन प्रभुपूजा की ओर झुकाववाला होता है और उसका जीवन शरीर, मन व मस्तिष्क सभी दृष्टिकोणों से उन्नतिवाला होता है।

हे सोम! (मन्दानः इत्) = निश्चय से मुझे उल्लासमय बनाता हुआ (वृषायसे) = मेरे जीवन में शक्तिशाली के रूप में आचरण करता है। मेरा जीवन निर्बल नहीं होता। सब प्रकार की निर्बलता से दूर होकर आज मैं प्रभु को पाने के योग्य बना हूँ। 
Essence
सोम के द्वारा मेरी सर्वांगीण उन्नति होती है।
Subject
सोम का महान् सुकर्म