Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 505

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣षे꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो मनी꣣षि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢ रु꣣चा꣡भि गा इ꣢꣯हि ॥५०५॥

इ꣣षे꣢ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः । म꣣नीषि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢꣯ । रु꣣चा꣢ । अ꣣भि꣢ । गाः । इ꣣हि ॥५०५॥

Mantra without Swara
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः । इन्दो रुचाभि गा इहि ॥

इषे । पवस्व । धारया । मृज्यमानः । मनीषिभिः । इन्दो । रुचा । अभि । गाः । इहि ॥५०५॥

Samveda - Mantra Number : 505
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
यह सोम मेरे जीवन में (इषे) = प्रभु की प्रेरणा के लिए (पवस्व) = पवित्रता करे। सोम के धारण से वासनाओं का नाश होकर मेरा जीवन इस प्रकार पवित्र हो कि मुझे हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा सुनाई पड़े। यह सोम (मनीषिभिः) = मन को बुद्धि के द्वारा नियन्त्रित करनेवाले समझदार लोगों से (धारया) = धारण के उद्देश्य से (मृज्यमानः) = शुद्ध किया जाता है। मनीषी बनना–मन को बुद्धिपूर्ण रखना- सोम संयम का सर्वोत्तम साधन है। धारित होकर यह हमारा धारण करता है। (धारया) = धारण के हेतु से ही तो विद्वानों ने इसका संयम किया।

(इन्दो) = मुझे शक्तिशाली बनानेवाले सोम! तू (रुचा) = दीप्त के हेतु से (गा अभि इहि) = वेदवाणी की ओर चल। वेदवाणी 'ब्रह्म' है- इसकी ओर चलना 'ब्रह्मचर्य' है। वेदवाणी का अध्ययन मुझे सोम के संयम में भी सहायक होता है। इसी संयम से मैं प्रभु - प्रेरण को भी सुननेवाला बनता हूँ।
Essence
 यह सोम मुझे पवित्र कर प्रभु - प्रेरणा को सुनने के योग्य बनाता है। 
Subject
प्रभु-प्रेरणा-श्रवण