Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 502

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡नु꣢ प्र꣣त्ना꣡स꣢ आ꣣य꣡वः꣢ प꣣दं꣡ नवी꣢꣯यो अक्रमुः । रु꣣चे꣡ ज꣢नन्त꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥५०२॥

अ꣡नु꣢꣯ । प्र꣣त्ना꣡सः꣢ । आ꣣य꣡वः꣢ । प꣣द꣢꣯म् । न꣡वी꣢꣯यः । अ꣣क्रमुः । रुचे꣢ । ज꣣नन्त । सू꣡र्य꣢꣯म् ॥५०२॥

Mantra without Swara
अनु प्रत्नास आयवः पदं नवीयो अक्रमुः । रुचे जनन्त सूर्यम् ॥

अनु । प्रत्नासः । आयवः । पदम् । नवीयः । अक्रमुः । रुचे । जनन्त । सूर्यम् ॥५०२॥

Samveda - Mantra Number : 502
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम के संयम से (रुचे) = कान्ति व शोभा के लिए संयमी पुरुष अपने अन्दर (सुर्यम्) = [सूर्य:=चक्षुः] एक विशेष दृष्टिकोण को (जनन्त) = उत्पन्न करते हैं। इस दृष्टिकोण का ही परिणाम होता है कि वे ('असित्') = विषयों से अबद्ध रहते हैं—'काश्यप'- अपने ज्ञान को उत्तरोत्तर दीप्त करते हैं-'देवल' - दिव्य गुणों को अपने अन्दर ग्रहण करते हैं। इस प्रकार का जीवन बनाने से (प्रत्नास आयव:) = पुराण व बृद्ध होते हुए भी ये मनुष्य (नवीयः पदम्) =अत्यन्त नवीन पद को - युवावस्था में (अनु अक्रमुः) = शनैः शनैः, क्रमशः प्रवेश करते हैं। इनकी सब शक्तियाँ ठीक होकर ये फिर से नौजवान हो जाते हैं। सोम के संयम से मनुष्य धीमे-धीमे अधिकाधिक स्वस्थ होता चलता है और वस्तुतः यौवन को पुनः प्राप्त कर लेता है। आचार्य ने सोम को वह ‘मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र' माना है जो कि सब रोगों की औषध है। देवों की भाँति मनुष्य कभी जीर्ण नहीं होता - अधिकाधिक युवा होता चलता है। वही स्तुत्यतम जीवन है [नु - स्तुतौ, नवीय: स्तुत्यतम ] ।
Essence
सोम का संयम 'पुनर्युवा' बनानेवाला है।
Subject
पुनर यौवन [ नव-यौवन ]