Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 500

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्यान्ध꣢꣯सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥५००॥

त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति । धा꣡रा꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥५००॥

Mantra without Swara
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः । तरत्स मन्दी धावति ॥

तरत् । सः । मन्दी । धावति । धारा । सुतस्य । अन्धसः । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥५००॥

Samveda - Mantra Number : 500
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जो व्यक्ति सोम की जोकि सारे भोजन का सार है रक्षा करता है वह 'अवत्सार' कहलाता है। यह ज्ञानी काश्यप तो है ही । (सः) = वह संसार में आनेवाली विघ्न-बाधाओं को (तरत्) = तैरता हुआ (मन्दी) = उल्लासवाला (धावति) = दौड़ता चलता है। ‘धाव्' धातु के दोनों अर्थ हैं गति और शुद्धि। यह मार्ग में आनेवाले विघ्नों का शोधन-सफाया करता है और आगे बढ़ता है। यह (सुतस्य) = उत्पन्न हुए - हुए (अन्धसः) = सर्वथा ध्यान देने योग्य सोम की (धारा) = [धारया] धारणशक्ति से आगे और आगे बढ़ता चलता है। ज्ञानी होने से रमणीय विषयों का भोग करता हुआ भी उनमें उलझता नहीं है। (सः) = वह तो (तरत्) = तेजी से तैरता हुआ (मन्दी) = सदा उत्साह में स्थित (धावति) = आगे बढ़ता ही चलता है।
 
Essence
मैं १. तैरते हुए, २. उत्साह में कमी न आने देते हुए, ३. आगे और आगे बढ़ता चलूँ।
Subject
तैरते हुए