Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 5

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्रे꣡ष्ठं꣢ वो꣣ अ꣡ति꣢थिꣳ स्तु꣣षे꣢ मि꣣त्र꣡मि꣢व प्रि꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ र꣢थं꣣ न꣡ वेद्य꣢꣯म् ॥५॥

प्रे꣡ष्ठ꣢꣯म् । वः꣣ । अ꣡ति꣢꣯थिम् । स्तु꣣षे꣢ । मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । इ꣣व । प्रिय꣢म् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । र꣡थ꣢꣯म् । न । वे꣡द्य꣢꣯म् ॥५॥

Mantra without Swara
प्रेष्ठं वो अतिथिꣳ स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥

प्रेष्ठम् । वः । अतिथिम् । स्तुषे । मित्रम् । मि । त्रम् । इव । प्रियम् । अग्ने । रथम् । न । वेद्यम् ॥५॥

Samveda - Mantra Number : 5
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
उपदेशक–इस मन्त्र का ऋषि ‘उशना' सबका हित चाहनेवाला, अपने श्रोतृवृन्द [Audience] से कहता है कि वे प्रभु( प्रेष्ठम्)=अत्यन्त कान्तिमान् हैं। ('दिवि सूर्यसहस्त्रस्य')= हज़ारों सूर्य के समान उस प्रभु की दीप्ति है। वे आदित्यवर्ण हैं, परन्तु इतने कान्तिमान् होते हुए भी वे प्रभु (वः) = तुम्हारे तो (अतिथिम्)= मेहमान की भाँति हैं। जिस प्रकार अतिथि के दर्शन घर पर कभी-कभी होते हैं, उसी प्रकार उस प्रभु का दर्शन भी कभी-कभी होता है। इसपर भी वह प्रभु (मित्रम् इव) = स्वाभाविक स्नेह करनेवाले मित्र की भाँति (प्रियम्)= विविध आवश्यक वस्तुओं की सृष्टि करके जीव को तृप्त करनेवाले हैं। जीव प्रभु की ओर अपनी दृष्टि करे या न करे, प्रभु तो उसपर अपनी कृपा-दृष्टि बनाये ही रखते हैं। माता-पिता के स्नेह में भी कुछ स्वार्थ हो सकता है, परन्तु उस स्वाभाविक मित्र का स्नेह स्वार्थ की गन्ध से परे है। 
वे प्रभु (अग्ने)=[अग्निं] जीव को आगे ले-चलनेवाले हैं। (रथं न)= रथ की भाँति (वेद्यम्)=जानने योग्य है। जिस प्रकार रथ से यात्रा की पूर्ति में सहायता मिलती है, उसी प्रकार मानव-जीवन की यात्रा भी इस प्रभुरूप रथ पर आरूढ़ होने से ही पूर्ण होगी। इस भावना को उपनिषदों में ‘ब्रह्म-निष्ठ' शब्द से स्पष्ट किया गया है। यही 'ईश्वर-प्रणिधान'=अपने को ईश्वर में रख देना है। इस जीवन-यात्रा में होनेवाले विविध विघ्नों को जीतने का एक ही उपाय है- ब्रह्मरूपी रथ में स्थित होना ।
ऋषि उशना कहते हैं कि इस ब्रह्म का ही (स्तुषे) मैं स्तवन करता हूँ, इसी के गुणों का गायन करता हूँ। यही तो कल्याण का मार्ग है। 
Essence
वे प्रभु अत्यन्त कान्तिमान्, जीव के मित्र, उसकी उन्नति के साधक तथा उसके लिए जीवन यात्रा में रथ के समान हैं।
Subject
यात्रा का रथ