Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 497

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡चि꣢क्रद꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रि꣢र्म꣣हा꣢न्मि꣣त्रो꣡ न द꣢꣯र्श꣣तः꣢ । स꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ण दिद्युते ॥४९७॥

अ꣡चि꣢꣯क्रदत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । म꣣हा꣢न् । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । द꣣र्शतः꣢ । सम् । सू꣡र्ये꣢꣯ण । दि꣣द्युते ॥४९७॥

Mantra without Swara
अचिक्रदद्वृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः । सꣳ सूर्येण दिद्युते ॥

अचिक्रदत् । वृषा । हरिः । महान् । मित्रः । मि । त्रः । न । दर्शतः । सम् । सूर्येण । दिद्युते ॥४९७॥

Samveda - Mantra Number : 497
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम (अचिक्रदत्) = पुकारता है - पुकारकर मन्त्र के ऋषि ‘मेधातिथि' से कहता है कि मुझे अपनाकर तो देखो। देखो कि मैं किस प्रकार १. (वृषा) = तुम्हारेलिए सुखों का वर्षक होता हूँ, किस प्रकार तुम्हें शक्ति - सम्पन्न [वृष] बनाता हूँ। २. (हरिः) = मैं तुम्हारे दुःखों का हरण करनेवाला हूँ-सब मलिनताओं को दूर भगानेवाला हूँ। तुम्हारे शरीर को शक्ति- सम्पन्न बनाता हूँ तो मन को निर्मल | ३. (महान्) = मैं तेरे हृदय को [मह पूजायाम् ] पूजा की वृत्ति से परिपूर्ण करके (महान्) = उदार बनाता हूँ। ४. (मित्रो न दर्शतः) = मेरे द्वारा तू सूर्य के समान दर्शनीय होता है—तेजस्वी बनता है। सूर्य 'मित्र' है—मृत्यु से बचानेवाला है। यह सोम भी सूर्य की भाँति ही रोगों से बचाकर मृत्यु से बचाता है और हमें सूर्य के समान तेजस्वी बनाता है।

इस सोम के द्वारा यह मेधातिथि (सूर्येण) = [सूर्यः चक्षुः] अपनी चक्षु से दृष्टिकोण से–(संदिद्युते) = सम्यक् चमकता है। सोमी पुरुष का दृष्टिकोण बड़ा सुन्दर होता है । यह संसार में समझदारी से चलता है। मेधा के साथ चलने से यह 'मेधातिथि' कहलाता है। कण-कण करके इसने मेधा का संचय किया है, अतः यह 'काण्व' है।
Essence
सोम मेरे दृष्टिकोण को सुन्दर बनाए ।
Subject
सूर्य के समान