Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 495

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣢ वी꣣ती꣡ परि꣢꣯ स्रव꣣ य꣡स्त꣢ इन्दो꣣ म꣢दे꣣ष्वा꣢ । अ꣣वा꣡ह꣢न्नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥४९५॥

अ꣣या꣢ । वी꣣ती꣢ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व । यः꣢ । ते꣣ । इन्दो । म꣡दे꣢꣯षु । आ । अ꣣वा꣡ह꣢न् । अ꣣व । अ꣡ह꣢꣯न् । न꣣वतीः꣢ । न꣡व꣢꣯ ॥४९५॥

Mantra without Swara
अया वीती परि स्रव यस्त इन्दो मदेष्वा । अवाहन्नवतीर्नव ॥

अया । वीती । परि । स्रव । यः । ते । इन्दो । मदेषु । आ । अवाहन् । अव । अहन् । नवतीः । नव ॥४९५॥

Samveda - Mantra Number : 495
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) = शक्ति देनेवाले सोम! तू (अया) = इस (वीती) = मार्ग से (परिस्त्रव) = मेरे अङ्ग - प्रत्यङ्ग में प्रवाहित हो (यः) = जिससे ते तेरा स्रवण- प्रवाह - (आ) = सब अङ्गों में चारों ओर (मदेषु) = मदों के निमित्त हो। सोम के शरीर में व्याप्त होने पर जीवन उल्लासमय बनता है। यह सोमी पुरुष (नवती:) = [नव गतौ] गतिमय- चञ्चल (नव) = पाँच ज्ञानेन्द्रियों व अन्तःकरण चतुष्टय [मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार] को (अवाहन्) = दूर कर देता है। चञ्चलता के हनन से चञ्चल इन्द्रियों का हनन हो जाता है। शत्रुता के नाश से शत्रु के मित्र बन जाने पर शत्रु नष्ट हो जाता है। चञ्चलता के नष्ट हो जाने पर ये नवती- अत्यंत अस्थिर इन्द्रियाँ भी नष्ट हो जाती हैं और उनके स्थान में अवस्थित इन्द्रियों व मन का उदय होता है। ('यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तमाहुः परमाङ्गतिम् ॥') = इस उपनिषद् वाक्य के अनुसार यही परमगति है। अमहीयु पुरुष ही इस परमगति को जानता है। पार्थिव भोगों की कामनाएँ तो मनुष्य को अत्यन्त चञ्चल बनाए रहती हैं।

यहाँ 'नव' से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व पाँच कर्मेन्द्रियों का भी ग्रहण हो सकता है। इसमें वाक् या जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों में समान होने से वस्तुतः संख्या नौ ही है। 
 
Essence
मेरा जीवन सोम के द्वारा उल्लासमय हो और मैं इन अस्थिर इन्द्रियों को स्थिर करनेवाला बनूँ।
Subject
नवतीर्नव का हनन या परमगति की प्राप्ति