Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 493

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या꣣ य꣢या꣣ सू꣢र्य꣣म꣡रो꣢चयः । हि꣣न्वानो꣡ मानु꣢꣯षीर꣣पः꣢ ॥४९३॥

अ꣣या꣢ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । य꣡या꣢꣯ । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣡रो꣢चयः । हि꣣न्वानः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षीः । अ꣣पः꣢ ॥४९३॥

Mantra without Swara
अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचयः । हिन्वानो मानुषीरपः ॥

अया । पवस्व । धारया । यया । सूर्यम् । अरोचयः । हिन्वानः । मानुषीः । अपः ॥४९३॥

Samveda - Mantra Number : 493
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम! (अया) = [अनया] इस (धारया) = धारण शक्ति से (पवस्व) = मेरे अन्दर बह या मेरे जीवन को पवित्र कर (यया) = जिससे तू (सूर्यम्) = मेरी चक्षु को [सूर्य: चक्षुर्भूत्वा] (अरोचयः) = दीप्त करता है। सोम से जीवन का धारण तो होता ही है। साथ ही मनुष्य की ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और उसका दृष्टिकोण ठीक हो जाता है। प्रत्येक वस्तु को ठीक रूप में रखने के कारण वह किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं होता और न किसी प्राणी के साथ द्वेष की भावनावाला होता है। दृष्टिकोण को ठीक करने से यह (मानुषी:) = मानव हितकारी (अपः) = कर्मों को (हिन्वानः) = प्रेरित करता है। वस्तुत: दृष्टिकोण की विकृति ही मनुष्य को स्वार्थपूर्ण - केवल अपने प्राण-पोषण के कर्मों मे उलझाये रखती है। सोम के संयम का यह परिणाम है कि हमारा दृष्टिकोण ठीक बनता है और हम परार्थ में ही स्वार्थ को सिद्ध होता देखते हैं। हमें परहित के कार्यों में रस आने लगता है।
Essence
सोम १. जीवन का धारण करता है - हमें दीर्घायुष्य बनाता है, २. हमारी चक्षु को दीप्त कर हमारे दृष्टिकोण को ठीक करता है ३. हमारा झुकाव लोकहित के कार्यों में हो जाता है।
Subject
मानव हितकारी कर्म