Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 492

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वसे꣣ मृ꣡धः꣢ क्रतु꣣वि꣡त्सो꣢म मत्स꣣रः꣢ । नु꣣द꣡स्वादे꣢꣯वयुं꣣ ज꣡न꣢म् ॥४९२॥

अ꣣पघ्न꣢न् । अ꣣प । घ्न꣢न् । प꣣वसे । मृ꣡धः꣢꣯ । क्र꣣तुवि꣢त् । क्र꣣तु । वि꣢त् । सो꣣म । मत्सरः꣢ । नु꣣द꣡स्व꣢ । अ꣡दे꣢꣯वयुम् । अ । दे꣣वयुम् । ज꣡न꣢꣯म् ॥४९२॥

Mantra without Swara
अपघ्नन्पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः । नुदस्वादेवयुं जनम् ॥

अपघ्नन् । अप । घ्नन् । पवसे । मृधः । क्रतुवित् । क्रतु । वित् । सोम । मत्सरः । नुदस्व । अदेवयुम् । अ । देवयुम् । जनम् ॥४९२॥

Samveda - Mantra Number : 492
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘निध्रुवि:'=निश्चय से स्थिरता की मनोवृत्तिवाला काश्यप- ज्ञानी कहता है कि हे (सोम) = सोम! तू (मृधः) = हिंसक कामादि को (अपघ्नन्) = नष्ट करता हुआ (पवसे) = हमारे जीवनों को पवित्र बनाता है। कामादि वासनाओं को नष्ट करके तू क्(रतुवित्) = उत्तम कर्म-संकल्पों को व यज्ञिय भावनाओं को प्राप्त करता है [विद्-लाभे] वासना की समाप्ति व भावना के उदय से यह सोम (मत्सरः) = आनन्द व उल्लास का जनक है।

हे सोम! (अदेवयुम्) = देव की ओर न जानेवाले - प्रभु की कामना न करनेवाले (जनम्) = मनुष्य को (नुदस्व) = एक धक्का लगा- उसे कुछ ऐसी प्रेरणा कर कि वह भोग की वृत्ति को छोड़कर आत्मा की ओर झुकाववाला बने । आत्मा की ओर झुक जाने पर इसकी चित्त-वृत्ति डावाडोल नहीं रहती—यह ‘स्थितिप्रज्ञ' - सा बन जाता है, 'निध्रुविः' हो जाता है। वस्तुतः स्थितिप्रज्ञ बनना ही ऊँचा ज्ञानी बनना है- 'काश्यप' होना है।
Essence
सोम १. मेरी वासना को समाप्त करता है २. यह यज्ञिय भावनाओं को मुझमें जन्म देता है। ३. उल्लास का कारण होता है और ४. मुझे 'देवयुः' – आत्प्रवण बनाता है।
Subject
अदेवयु का नोदन [Giving of a shock to अदेवयु ]