Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 472

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢येन्दो म꣣रु꣡त्व꣢ते꣣ प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तमः । अ꣣र्क꣢स्य꣣ यो꣡नि꣢मा꣣स꣡द꣢म् ॥४७२॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । इ꣣न्दो । मरु꣡त्व꣢ते । प꣡व꣢꣯स्व । म꣡धु꣢꣯मत्तमः । अ꣣र्क꣡स्य꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡दम् ॥४७२॥

Mantra without Swara
इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः । अर्कस्य योनिमासदम् ॥

इन्द्राय । इन्दो । मरुत्वते । पवस्व । मधुमत्तमः । अर्कस्य । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥४७२॥

Samveda - Mantra Number : 472
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्र में सोम को 'इन्दु' नाम से स्मरण किया गया है। इन्द्- जव इम चवूमतनिस धातु से बना यह शब्द बतला रहा है कि यह सोम मनुष्य को अत्यन्त शक्तिशाली बनानेवाला है। इस इन्दु को सम्बोधन करते हुए मन्त्र का ऋषि 'कश्यप मारीच' कहता है कि हे (इन्दो) = शक्तिशाली बनानेवाले सोम! तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय के लिए - इन्द्रियों की आधीनता में न चलकर उन्हें अपना उपकरण बनानेवाले और (मरुत्वते) = प्राणशक्ति-सम्पन्न मेरे लिए (मधुमत्तमः) = अत्यन्त माधुर्यवाला होकर (पवस्व) = बह या मेरे जीवन को पवित्र कर । वस्तुतः सोम का रक्षण ‘इन्दु व महान्' बनने से ही सम्भव है । जितेन्द्रियता व प्राणसाधना मनुष्य को उर्ध्वरेतस् बनाती है। सोम रक्षा के लिए जीभ मेरे वश में होनी चाहिए। साथ ही ब्रह्मचर्य के लिए प्राणायाम अत्यन्त आवश्यक है। इन दोनों साधनों से मैं सोमरक्षा करूँगा तो यह सोम मेरे जीवन को अत्यन्त माधुर्यवाला बना देगा । 'भूयासं' मधुसन्दृशः' यह वेदवाक्य मेरे जीवन में घटित होता दिखेगा। यह माधुर्य आवश्यक है, इसके बिना में उस 'रस' - स्वरूप परमात्मा को कैसे पा सकता हूँ? अतः (अर्कस्य) = उस अर्चनीय परमात्मा के (योनिम्) = स्थान व पद को (आसदम्) = पाने के लिए मैं मधुर बनूँ। मधुर बनूँगा सोम रक्षा से और सोमरक्षा होगी इन्द्र और मरुत्वान् बनने से। इन्द्र बनकर मैं सब असुरों को मारनेवाला 'मारीच' बनूँ और मरुत्वान् बनकर ज्ञानदीप्ति को बढ़ाकर ‘कश्यप' बनूँ। संसार के स्वाद को मारना प्रभु-प्राप्ति के स्वाद पाने के लिए आवश्यक है। यह स्वाद ज्ञान से ही आएगा।
Essence
प्रभु-कृपा से मैं 'इन्द्र और मरुत्वान्' बनूँ- दूसरे शब्दों में ‘मारीच कश्यप' बनूँ।
Subject
अत्यन्त मधुर बनकर [ इन्दु ]