Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 47

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡द꣢र्शि गातु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ य꣡स्मि꣢न्व्र꣣ता꣡न्या꣢द꣣धुः꣢ । उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣡मार्य꣢꣯स्य व꣡र्ध꣢नम꣣ग्निं꣡ न꣢क्षन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥४७॥

अ꣡द꣢꣯र्शि । गा꣣तुवि꣡त्त꣢मः । गा꣣तु । वि꣡त्त꣢꣯मः । य꣡स्मि꣢꣯न् । व्र꣣ता꣡नि꣢ । आ꣣दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । सु꣢ । जा꣣त꣢म् । आ꣡र्य꣢꣯स्य । व꣡र्ध꣢꣯नम् । अ꣣ग्नि꣢म् । न꣣क्षन्तु । नः । गि꣡रः꣢꣯ ॥४७॥

Mantra without Swara
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः । उपो षु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिरः ॥

अदर्शि । गातुवित्तमः । गातु । वित्तमः । यस्मिन् । व्रतानि । आदधुः । आ । दधुः । उप । उ । सु । जातम् । आर्यस्य । वर्धनम् । अग्निम् । नक्षन्तु । नः । गिरः ॥४७॥

Samveda - Mantra Number : 47
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्निम्)=आगे ले-चलनेवाले प्रभु को (न:) = हमारी (गिरः) = वाणियाँ (नक्षन्तु) = प्राप्त हों, अर्थात् हम सदा प्रभु को पुकारें, उसी का द्वार खटखटाएँ [नक्ष= to knock at] जो प्रभु (आर्यस्य) = उन्नति के मार्ग पर नियमपूर्वक चलनेवाले को [ऋ=गतौ, इयर्ति इति आर्य :] (वर्धनम्) = उत्साहित करनेवाले हैं (उ)=और (उप षु जातम्) = उत्तम प्रकार से समीप प्राप्त होनेवाले हैं। जो आर्यपुरुष इस देवमार्ग पर नियमपूर्वक चलते रहते हैं, वे एक दिन उस प्रभु के समीप पहुँच जाते हैं। किस प्रभु के समीप ? (यस्मिन् व्रतानि आदधुः) = जिसकी प्राप्ति के निमित्त [निमित्त सप्तमी] विविध व्रतों को धारण किया करते हैं। ('यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति') = जिस प्रभु को चाहते हुए ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया करते हैं। वस्तुतः प्रत्येक उत्तम व्रत हमें उस प्रभु के कुछ समीप ही ले जाता है।

इस प्रभु को (अदर्शि) = देखता है। कौन? (गातुवित्तमः) = [गातु+वित्+तमः] अतिशयेन देवमार्ग को प्राप्त करनेवाला। जो व्यक्ति इस देवमार्ग पर सर्वाधिक चलता है [विद् लाभे]। हम सब अपने अन्दर आर्यत्व, व्रतशीलता तथा उत्तम मार्ग पर चलने की भावनाओं को भरकर इस मन्त्र के ऋषि 'सोभरि' हों।
Essence
गत मन्त्र में देवमार्ग का उल्लेख हुआ था, जो नियम से इस मार्ग पर चलता है, वह प्रभु के समीप पहुँचकर उसका दर्शन करता है।
Subject
प्रभु को कौन देखता है?