Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 469

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या म꣣रु꣡त्व꣢ते च मत्स꣣रः꣡ । वि꣢श्वा꣣ द꣡धा꣢न꣣ ओ꣡ज꣢सा ॥४६९॥

वृ꣡षा꣢꣯ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । म꣣रु꣡त्व꣢ते । च꣣ । मत्सरः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣡धा꣢꣯नः । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥४६९॥

Mantra without Swara
वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः । विश्वा दधान ओजसा ॥

वृषा । पवस्व । धारया । मरुत्वते । च । मत्सरः । विश्वा । दधानः । ओजसा ॥४६९॥

Samveda - Mantra Number : 469
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम! तू (वृषा) = शक्तिशाली होता हुआ (धारया) = अपनी धारणशक्ति से (पवस्व) = हमारे में प्रवाहित हो। सोम का शरीर में प्रवेश हमारे शरीर को शक्तिशाली बनाता है। (च) = यह सोम (मरुत्वते) = मरुत्वान् के लिए प्राणों की साधना करनेवाले के लिए (मत्सरः) = आनन्द प्रवाहित करनेवाला होता है। प्राण - साधना के बिना सोम का पूर्णरूप से पान नहीं होता, प्राणायाम ही मनुष्य को उर्ध्वरेतस् बनाता है, उर्ध्वरेतस् बनने पर उसका शरीर नीरोग व सशक्त होता है और उसका मन निर्मल व आह्लादमय बनता है।

यह सोम ही (विश्वा) = सबको (ओजसा-दधानः) = ओज से धारण करनेवाला होता है। सोम से केवल दीर्घायुष्य प्राप्त हो ऐसी बात नहीं - यह जीवन अन्त तक शक्तिशाली भी बना रहता है।

प्राणायामरूप तप से अपना परिपाक करके ही यह सोम का पान कर पाता है अतः यह 'भृगु' [तपस्वी] है। इसका जीवन इस सोमपान से सुन्दर व श्रेष्ठ बनता है, अतः ‘वारुणि' है। इसकी पाचन शक्ति अन्त तक ठीक बनी रहती है, अतः यह 'जमदग्नि' है।
Essence
सोमपान से मैं १. 'शक्तिशाली' बनूँ २. उल्लासमय जीवनवाला होऊँ और ३. जीवन के अन्तिम क्षण तक ओजस्वी बना रहूँ।
Subject
दीर्घ ओजस्वी जीवन