Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 456

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- एकपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य राजति ॥४५६॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । रा꣣जति ॥४५६॥

Mantra without Swara
इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥

इन्द्रः । विश्वस्य । राजति ॥४५६॥

Samveda - Mantra Number : 456
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘उच्च स्थिति को प्राप्त करके कहीं अभिमान का आक्रमण न हो जाए' अतः मनुष्य को ध्यान रखना चाहिए कि (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु ही वस्तुतः (विश्वस्य) = सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त, सारे ऐश्वर्य का (राजति) = प्रभुत्व करते हैं। सब ऐश्वर्य उस प्रभु का है मुझे तो उस प्रभु ने अपनी सम्पदा का न्यसी [Trustee] बनाया है। यह विचार इसे अभिमानी नहीं बनने देता।
Essence
उस इन्द्र के ऐश्वर्य का व भगवान् के भग का ध्यान करता हुआ मैं उन्नति में भी विनत बना रहूँ।
Subject
अभिमान-निरास