Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 455

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- आत्रेयः Chhand- द्विपदा त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जा꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢꣯णः पिन्व꣣ते꣢डाः꣣ पी꣡व꣢री꣣मि꣡षं꣢ कृणु꣣ही꣡ न꣢ इन्द्र ॥४५५

ऊ꣣र्जा꣢ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । पि꣣न्वत । इ꣡डाः꣢꣯ । पी꣡व꣢꣯रीम् । इ꣡ष꣢꣯म् । कृ꣣णुहि꣢ । नः꣣ । इन्द्र ॥४५५॥

Mantra without Swara
ऊर्जा मित्रो वरुणः पिन्वतेडाः पीवरीमिषं कृणुही न इन्द्र ॥४५५

ऊर्जा । मित्रः । मि । त्रः । वरुणः । पिन्वत । इडाः । पीवरीम् । इषम् । कृणुहि । नः । इन्द्र ॥४५५॥

Samveda - Mantra Number : 455
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(मित्रः) = स्नेह की देवता और (वरुण:) = [पाशी] अपने को व्रतों में बाँधने की भावना (ऊर्जा) = शक्ति से इडा : हमारी वेदवाणियों को (पिन्वत) बढ़ाएँ। हमारे अन्दर शक्ति हो, और शक्ति के साथ ज्ञान की वाणियों का पोषण हो। इसके लिए हम मित्र और वरुण से आराधना करें। हम अपने में ‘मित्र = स्नेह' की भावना को प्रबुद्ध करें। स्नेह 'काम' को समाप्त कर-ज्ञान को दीप्त करता है और शक्ति की वृद्धि का हेतु होता है। इस स्नेह की भावना के साथ अपने को ‘व्रतों के बन्धन में वाँधने की भावना' तो सब उन्नतियों का मूल ही है। वरुण व्रतों की देवता है साथ ही ‘प्रचेता:' प्रकृष्ट ज्ञानवाला है। व्रतमय जीवन बुद्धि के नैर्मल्य व तीक्ष्णता के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है। संक्षेप में, ये मित्र और वरुण हमारी शक्ति व ज्ञान की वृद्धि के कारण बनते हैं, और इस प्रकार हमारा अध्यात्म जीवन उत्कृष्ट होता है। सामाजिक जीवन के उत्कर्ष के लिए (इन्द्र) = हे परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (नः) = हमें (पीवरीम् इषम्) = पर्याप्त सम्पत्ति (कृणुहि) = प्राप्त कराइए । धन के बिना हम धर्म के कार्य भी नहीं कर पाते। सामाजिक स्थिति के उत्कर्ष के लिए सम्पत्ति की आवश्यकता है ही। उससे औरों की सहायता कर पाऊँगा। शक्ति व ज्ञान अध्यात्म जीवन को सुन्दर बना रहे थे, तो सम्पत्ति ने उनके साथ मिलकर मेरे सामाजिक जीवन को भी ऊँचा कर दिया है। इस उच्च जीवन को सुची - सम्पन्न व यशस्वी जीवन को प्राप्त करके मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक इन सभी कष्टों से ऊपर उठ गया हूँ - इस मन्त्र का ऋषि ‘आत्रेय' [अ-त्रि] बन गया हूँ।
 
Essence
मैं अपने जीवन को स्नेह व व्रतों के बन्धनवाला बनाऊँ।
Subject
स्नेह व्रतसम्पत्ति