Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 453

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- कवष ऐलूषः Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
वि꣢ स्रु꣣त꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थ꣢꣫ इन्द्र꣣ त्व꣡द्य꣢न्तु रा꣣त꣡यः꣢ ॥४५३॥

वि꣢ । स्रु꣣त꣡यः꣢ । य꣡था꣢꣯ । प꣣थः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वत् । य꣣न्तु । रात꣡यः꣢ ॥४५३॥

Mantra without Swara
वि स्रुतयो यथा पथ इन्द्र त्वद्यन्तु रातयः ॥

वि । स्रुतयः । यथा । पथः । इन्द्र । त्वत् । यन्तु । रातयः ॥४५३॥

Samveda - Mantra Number : 453
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु जीव से कहते हैं कि 'तू चाहता है कि ये सब भुवन तेरे लिए साधन ही बनें रहें, साध्य न हो जाएँ' इसके लिए तू (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय बन । इन्द्रियों को वश में करना ढ़ाल है जो मनुष्य को वासनाओं के आक्रमण से बचाती है। ये जितेन्द्रियतारूप ढाल तूझे इस इला= पृथिवी में ष = समाप्त न होने देगी। तू इन पार्थिव भोगों का अन्त करके 'ऐलूष' बनेगा। इस जितेन्द्रियता व अनासक्ति की वृत्ति को जगाने के लिए (त्वत्) = तुझ से (रातय:) = दान के प्रवाह उसी प्रकार (यान्तु) - चलें (यथा) = जैसे (वि-स्त्रुतयः) = विविध नदियों के प्रवाह (पथा) = मार्ग से बहते हुए चले जाते हैं।

पर्वतों से नदियों के प्रवाहों की भाँति दानों के प्रवाहों के चलने पर मनुष्य इन धनादि पदार्थों में आसक्त नहीं होता। ये उसके लिए साधन ही बने रहते हैं। दान सचमुच आसक्ति का दान=छेदन रकनेवाला है और दान-शोधन का कारण है। इस प्रकार यह दान जीव की कवच=ढाल बन जाता है। इस ढालवाला ऋषि ‘कवष' नामवाला हो गया है यह सब पार्थिव भोगों को समाप्त करने के कारण ‘ऐलूष' तो है ही। 
Essence
हम धन को साधन ही समझें और हमसे दान का प्रवाह बहते रहें।
Subject
दान के प्रवाह बहें