Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 446

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य वृत्र꣣ह꣡न्त꣢माय꣣ वि꣡प्रा꣢य गा꣣थं꣡ गा꣢यत꣣ यं꣢ जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥४४६॥

प्र꣢ । वः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢माय । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯माय । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । गाथ꣢म् । गा꣣यत । य꣢म् । जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥४४६॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥

प्र । वः । इन्द्राय । वृत्रहन्तमाय । वृत्र । हन्तमाय । विप्राय । वि । प्राय । गाथम् । गायत । यम् । जुजोषते ॥४४६॥

Samveda - Mantra Number : 446
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गाथं (प्रगायत) = गाथा का खूब गायन करो। किसके लिए? (वः इन्द्राय) = परमैश्वर्य प्राप्त करानेवाले के लिए, (वृत्र हन्तमाय) - वासनाओं का अधिक-से-अधिक नाश करनेवाले के लिए और विप्राय= विशेषरूप से पूरण करनेवाले के लिए।

प्रभु का हम गायन करते हैं तो वे प्रभु परम ऐश्वर्य तो प्राप्त कराते ही हैं, परन्तु महत्त्वपूर्ण परिणाम यह होता है कि हमारी वासनाओं का विनाश हो जाता है। वासनाओं का विनाश ही मलों का दूर होना है। उस निर्मल हृदय में प्रभु के सान्निध्य से दिव्य भावनाओं का भरण होता है। राग-द्वेष का स्थान प्रेम ले-लेता है, औरों को तुच्छ समझने का स्थान करुणा ले-लेती है, ईर्ष्या के स्थान मे आगे बढ़ने की भावना उत्पन्न होती है, अभिमान का स्थान विनय लेती है और भय के स्थान मे देवपूजा की भावना उत्पन्न हो जाती है। इस परिवर्तन का अनुभव करनेवाले विद्वान् (यं) = जिस प्रभु को (जुजोषते) = प्रीतिपूर्वक सेवन करते हैं हम भी उस प्रभु की उपासना करें। 
Essence
प्रभु की उपासना से हमारे हृदयों का शोधन होगा और उनमें दिव्यता का पूरण होगा।
Subject
शोधन-पूरण