Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 443

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- संवर्त आङ्गिरसः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ या꣢हि꣣ व꣡न꣢सा स꣣ह꣡ गाव꣢꣯ सचन्त वर्त꣣निं꣡ यदूध꣢꣯भिः ॥४४३॥

आ꣢ । या꣣हि । व꣡न꣢꣯सा । स꣣ह꣢ । गा꣡वः꣢꣯ । स꣣चन्त । वर्त्तनि꣢म् । यत् । ऊ꣡ध꣢꣯भिः ॥४४३॥

Mantra without Swara
आ याहि वनसा सह गाव सचन्त वर्तनिं यदूधभिः ॥

आ । याहि । वनसा । सह । गावः । सचन्त । वर्त्तनिम् । यत् । ऊधभिः ॥४४३॥

Samveda - Mantra Number : 443
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वन् धातु का अर्थ है–‘सम्भक्ति'। सम्भजन का अभिप्राय है 'एकाग्रचित्त से प्रभु का ध्यान'। मनुष्य प्रभु के ध्यान में तल्लीन हो, उसे किसी सांसारिक वस्तु का ध्यान न हो वह योगनिद्रा गत हो—ऐसे ध्यान को ‘वनस्' कहते हैं। जब मनुष्य इस ध्यान की स्थिति में होता है तो (वनसा सह) = इस उपासना के साथ हे प्रभो! (आयाहि) = आप मुझे प्राप्त होओ। वस्तुतः तन्मयता मे बिना प्रभु प्राप्ति सम्भव नहीं । =

इस उपासना का परिणाम यह होता है कि (गावः) = इन्द्रियाँ (वर्तनिं सचन्त) = मार्ग का सेवन करती हैं। उपासक की इन्द्रियाँ, प्रभु का राज्य हो जाने पर, अपने मार्ग से विचलित नहीं होती। दिन में तो क्या? (यत् उदभिः) = जब रातों में भी इन्द्रियाँ मार्ग से विचलित नहीं होतीं, तब समझना चाहिए कि उपासना ठीक हुई। मेरी वाणी दिन में ही असत्य नहीं बोलती यह नहीं, रात स्वप्न में भी मैं असत्य नहीं बोलता - यही तो उपासना की महिमा है। इससे जीवन का मार्ग ही पलट गया। असत् से सत् की ओर अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर चल पड़ने से यह ऋषि ‘संवर्त' नामवाला हुआ है। 'संवर्तते इति संवर्त:'-जो उत्तम मार्ग पर चल रहा है।
Essence
मैं अनन्यभाव से प्रभु का भजन करूँ। परिणामतः प्रभु का दर्शन करनेवाला बनूँ और दिन में तो क्या रात्रि में भी इन्द्रियाँ मार्ग से विचलित न हों।
Subject
उपासना के लाभ