Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 442

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣢दा꣣ गा꣢वः꣣ शु꣡च꣢यो वि꣣श्व꣡धा꣢यसः꣣ स꣡दा꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢रे꣣प꣡सः꣢ ॥४४२

स꣡दा꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । शु꣡च꣢꣯यः । वि꣣श्व꣡धा꣢यसः । वि꣣श्व꣢ । धा꣣यसः । स꣡दा꣢꣯ । दे꣣वाः꣢ । अ꣣रेप꣡सः꣢ । अ꣣ । रेप꣡सः꣢ ॥४४२॥

Mantra without Swara
सदा गावः शुचयो विश्वधायसः सदा देवा अरेपसः ॥४४२

सदा । गावः । शुचयः । विश्वधायसः । विश्व । धायसः । सदा । देवाः । अरेपसः । अ । रेपसः ॥४४२॥

Samveda - Mantra Number : 442
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(देवा:) = देनेवाले (सदा) = हमेशा (अरपेसः) = निष्पाप होते हैं। दान-देना, दान=खण्डन, दान=शोधन। दान शब्द के उल्लिखित तीन अर्थ ही दान की निष्पापता को जन्म देनेवाली शक्ति को व्यक्त करते हैं। लोभ सब पापों का मूल है - दान उस मूल पर कुठाराघात करता हुआ पापों का उन्मूलन कर देता है। इस बात को वेद एक उदाहरण से भी इस रूप में व्यक्त करता है कि (गाव:) = गौएँ (सदा) = हमेशा (शुचयः) = पवित्र हैं। इनका मलमूत्र भी कृमिघातक होकर शोधक हो जाता है। गोमूत्र कितने ही रोगों को दूर करता है, गोमय किस प्रकार यज्ञवेदि के नैर्मल्य का कारण बनता है? गौवों की इस पवित्रता का हेतु भी वेद की दृष्टिकोण में यही है कि ये (विश्वधायसः) = सभी को दूध पिलाकर पालनेवाली हैं। गौवें जीवन देती हैं, देने से ही पवित्र हैं। मनुष्य भी देता है, तो दान से देव बन जाता है और निष्पापता का लाभ करता है। यह निष्पापता ही तो उसके ब्राह्मीभाव का कारण बनेगी।
Essence
दानी निष्पाप होता है, देव बनता है और महादेव को प्राप्त करता है। 
Subject
निष्पापता