Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 441

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
शं꣢ प꣣दं꣢ म꣣घ꣡ꣳ र꣢यी꣣षि꣢णे꣣ न꣡ काम꣢꣯मव्र꣢तो꣡ हि꣢नोति꣣ न꣡ स्पृ꣢शद्र꣣यि꣢म् ॥४४१

श꣢म् । प꣣द꣢म् । म꣣घ꣢म् । र꣣यीषि꣡णे꣢ । न । का꣡म꣢꣯म् । अ꣣व्रतः꣢ । अ꣣ । व्रतः꣢ । हि꣣नोति । न꣢ । स्पृ꣣शत् । रयि꣢म् ॥४४१॥

Mantra without Swara
शं पदं मघꣳ रयीषिणे न काममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम् ॥४४१

शम् । पदम् । मघम् । रयीषिणे । न । कामम् । अव्रतः । अ । व्रतः । हिनोति । न । स्पृशत् । रयिम् ॥४४१॥

Samveda - Mantra Number : 441
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(शं पदम्) = पूर्ण शान्ति के स्थान के स्थान को, जोकि (मघम्) = निर्मल ऐश्वर्य से पूर्ण है, उसे (रयीषिण:) = [ईष = to give] धन को दे डालनेवाले- दानी प्राप्त करते हैं। पूर्ण शान्ति को ब्रह्म को वही प्राप्त करता है जो धन के प्रति आसक्त नहीं होता। जो भी व्यक्ति (अव्रतः) = इस दान के व्रत को धारण नहीं करता वह (कामम्) = बेशक कितना ही हाथ-पैर मारे (न हिनोति) = इस शान्ति के पद को प्राप्त नहीं करता । धन के संग्रह में शान्ति है भी तो नहीं। यह अव्रत पुरुष उस ऐश्वर्यपूर्ण शान्त स्थान को प्राप्त भी क्यों कर करे (न स्पृशत् रयिम्) = इससे धन का दान भी तो नहीं किया। [स्पर्शनम् = दानम्] । धन का दान करे, प्रकृति में आसक्त न हो, तभी उस शान्त पद को प्राप्त कर सकता है।
Essence
शान्ति की प्राप्ति ब्राह्मीभाव में है, यह भाव सर्वलोकहित में रत होने से प्राप्त होता है। उसी भूतहित का प्रतीक दान है।
Subject
पूर्ण शान्ति व ऐश्वर्य