Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 440

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡न꣢वस्ते꣣ र꣢थ꣣म꣡श्वा꣢य तक्षु꣣स्त्व꣢ष्टा꣣ व꣡ज्रं꣢ पुरुहूत द्यु꣣म꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

अ꣡न꣢꣯वः । ते꣣ । र꣡थ꣢꣯म् । अ꣡श्वा꣢꣯य । त꣣क्षुः । त्व꣡ष्टा꣢꣯ । व꣡ज्र꣢꣯म् । पु꣣रुहूत । पुरु । हूत । द्युम꣡न्त꣢म् ॥४४०॥

Mantra without Swara
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षुस्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम् ॥

अनवः । ते । रथम् । अश्वाय । तक्षुः । त्वष्टा । वज्रम् । पुरुहूत । पुरु । हूत । द्युमन्तम् ॥४४०॥

Samveda - Mantra Number : 440
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अनव:) = मनुष्य (ते) = वे हैं जो (रथम्) = इस शरीररूपरथ को (अश्वाय) = [अश् व्याप्तौ] उस सर्वव्यापक परमात्मा के लिए (तक्षुः) = बनाते हैं। वस्तुतः मनुष्य वह है जो कि प्रेयमार्ग की चमक से न उलझकर श्रेयमार्ग का अवलम्बन करता है। प्रकृति के भोगों में न फँसकर जिसने प्रभु-प्राप्ति के मार्ग का अवलम्बन किया वही मनुष्य कहलाने के योग्य है। संसार के भोगों में उलझकर जीवन यापन कर देना पाशविक जीवन है। मनुष्य प्रभु की ओर चलता है - पशु प्रकृति की ओर।

(त्वष्टा) = निर्माता वह है जो (वज्रम्) = अपनी क्रिया को (द्युमन्तम्) = प्रकाशमय [ततक्ष] बनाता है। वस्तुतः जिस क्रिया में प्रकाश है, अर्थात् जो क्रिया विवेकपूर्वक की जाएगी वह सदा निर्माण करनेवाली होगी। हे (पूरुहूत) = पूरण करनेवाले प्रभो! मैं तो आपका निमित्तमात्र हूँ। निर्माण में गौरव है- गौरव का अनुभव करना ही चाहिए परन्तु यही गर्व में परिणत होकर हमारी विजय को पराजय में कर देता है।
Essence
हम प्रभुप्राप्ति के मार्ग पर चलकर मानवजीवन को सफल करें। प्रकाशमय क्रियावाले होकर कुछ-न-कुछ निर्माण करनेवाले हों।
Subject
सफल जीवन