Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 436

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम द्यु꣣म्नी꣡ सु꣢धा꣣रो꣢ म꣣हा꣡ꣳ अवी꣢꣯ना꣣म꣡नु꣢पू꣣र्व्यः꣢ ॥४३६॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । द्युम्नी꣢ । सु꣣धारः꣢ । सु꣣ । धारः꣢ । म꣣हा꣢न् । अ꣡वी꣢꣯नाम् । अ꣡नु꣢꣯ । पू꣣र्व्यः꣢ ॥४३६॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम द्युम्नी सुधारो महाꣳ अवीनामनुपूर्व्यः ॥

पवस्व । सोम । द्युम्नी । सुधारः । सु । धारः । महान् । अवीनाम् । अनु । पूर्व्यः ॥४३६॥

Samveda - Mantra Number : 436
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = सोम! (अनु पवस्व) = तू हमारे जीवन को अनुकूलता से पवित्र कर । (द्युम्नी) = ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर हमारे मस्तिष्क को द्युतिमय - ज्योतिर्मय कर । (सुधा-र:) = हमें अमृतत्त्व देनेवाला हो। हम तेरा पान करनेवाले बनें और अमृत्त्व का लाभ करें। (महान्) = तेरे धारण से हमारे हृदय तुच्छता से दूर और विशालता से सम्पन्न हों। तू (अवीनाम् पूर्व्यः) = रक्षकों में सर्वप्रथम है। सोम की रक्षा होने पर रोग शरीर को पीड़ित नहीं कर सकते, इन्द्रियों को निर्बलता आक्रान्त नहीं कर पाती, मन ईर्ष्या-द्वेषवाला नहीं होता और बुद्धि कुण्ठता को प्राप्त नहीं होती। इस प्रकार यह सोम प्रत्येक कोश की रक्षा करनेवाला है। वस्तुतः सोम ही जीवन का आधारभूत तत्त्व है। इसी से जीवन का धारण व उत्थान होता है।
Essence
हम सोम की महिमा को समझें और उसके धारण को महत्त्व दें।
Subject
ज्योति व अमरता