Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 433

1875 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
क꣢ ईं꣣꣬ व्य꣢꣯क्ता꣣ न꣢रः꣣ स꣡नी꣢डा रु꣣द्र꣢स्य꣣ म꣢र्या꣣ अ꣢था꣣ स्व꣡श्वाः꣢ ॥४३३॥

के꣢ । ई꣣म् । व्य꣡क्ता꣢ । वि । अ꣣क्ताः । न꣡रः꣢꣯ । स꣡नी꣢꣯डाः । स । नी꣣डाः । रुद्र꣡स्य꣢ । म꣡र्याः꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯ । स्वश्वाः꣢꣯ । सु꣣ । अ꣡श्वाः꣢꣯ ॥४३३॥

Mantra without Swara
क ईं व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अथा स्वश्वाः ॥

के । ईम् । व्यक्ता । वि । अक्ताः । नरः । सनीडाः । स । नीडाः । रुद्रस्य । मर्याः । अथ । स्वश्वाः । सु । अश्वाः ॥४३३॥

Samveda - Mantra Number : 433
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम के प्रभाव से अपने को श्रीसम्पन्न व ऊर्जावाले बनकर ये लोग जब समाज में लोकसंग्रह के लिए विचरते हैं तो समान्य जनता कह उठती है कि (के) = कौन हैं ये? (ईम) = सचमुच (व्यक्ता:) = [वि अक्ताः] इस अद्भुत कान्तिवाले, (नरः) = नियतरूप से अपने को आगे और आगे प्राप्त करानेवाले, (सनीडा:) = उस प्रभु के साथ एक ही निवास स्थान में रहनेवाले, (रुद्रस्य मर्याः) = सबको उपदेश देनेवाले प्रभु के ही मनुष्य (अथा) = और सबसे बड़ी बात यह कि (स्वश्वाः) = उत्तम इन्द्रियरूप घोड़ों वाले।

सोम के पान ने इनके जीवन में उपर्युक्त अद्भुत प्रभाव उत्पन्न किये हैं। इन प्रभावों के कारण सामान्य जनता की दृष्टि में ये अतिमानव, बन जाते हैं। ये प्रकृति के उपासक न होकर प्रभु के उपासक होते हैं - और वस्तुतः इसी कारण प्रकृति का अन्याय्य प्रयोग नहीं करते। ये अपने को प्रभु का निमित्तमात्र मानते हैं। प्रकृति के agent तो बनते ही नहीं। इसी बात को मन्त्र में ‘रुद्रस्य मर्याः' शब्दों से कहा गया है। इन्द्रियों पर पूर्ण प्रभुत्व पाकर ही मनुष्य परमेश्वर का होता है - ये प्रभु के व्यक्ति 'वशिष्ठ' हैं 'मैत्रावरुणि' हैं। 
Essence
सोम के सेवन से ही हम कान्तिसम्पन्न, आगे बढ़नेवाले, प्रभु के साथ रहनेवाले उनके सेवक बनें।
Subject
ये कौन?