Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 432

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- त्रिपदा अनुष्टुप्पिपीलिकामध्या Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢नु꣣ हि꣡ त्वा꣢ सु꣣त꣡ꣳ सो꣢म꣣ म꣡दा꣢मसि म꣣हे꣡ स꣢मर्य꣣रा꣡ज्ये꣢ । वा꣡जा꣢ꣳ अ꣣भि꣡ प꣢वमान꣣ प्र꣡ गा꣢हसे ॥४३२॥

अ꣡नु꣢꣯ । हि । त्वा꣣ । सुत꣢म् । सो꣣म । म꣡दा꣢꣯मसि । म꣣हे꣢ । स꣣मर्यरा꣡ज्ये꣢ । स꣣मर्य । रा꣡ज्ये꣢꣯ । वा꣡जा꣢꣯न् । अ꣣भि꣢ । प꣣वमान । प्र꣢ । गा꣣हसे ॥४३२॥

Mantra without Swara
अनु हि त्वा सुतꣳ सोम मदामसि महे समर्यराज्ये । वाजाꣳ अभि पवमान प्र गाहसे ॥

अनु । हि । त्वा । सुतम् । सोम । मदामसि । महे । समर्यराज्ये । समर्य । राज्ये । वाजान् । अभि । पवमान । प्र । गाहसे ॥४३२॥

Samveda - Mantra Number : 432
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = वीर्यशक्ति! (सुतम्) = उत्पन्न हुई (त्वा अनु) = तेरे अनुपात में (हि) = निश्चय से (मदामसि) = हम उल्लासमय जीवनवाले होते हैं। सामरक्षा का जीवन पर सबसे स्थूल प्रभाव तो यही है कि जीवन में एक उल्लास होता है। संसार असार - सा नहीं लगता। उस पूर्ण प्रभु की बनाई हुई यह रचना अपूर्ण हो ही कैसे सकती है? दूसरा परिणाम यह होता है कि यह सोम हमें (महे) = महान् (समर्यराज्ये) = उत्तम स्वामी के राज्य में समर्थ बनाता है। हम अपनी बुद्धि, मन व इन्द्रियों के स्वामी होते हैं - इनपर हमारा राज्य होता है। ये आत्मा के वश में होकर विषयों में विचरण करती हैं इनकी प्रत्येक क्रिया नियमित होती है। यहाँ इन्द्रियों, मन व बुद्धि का शासन नहीं चलता- आत्मा का शासन होता है।

इस सोमरक्षा का तीसरा परिणाम इन शब्दों में कहा है कि (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम! तू (वाजान् अभि) = वाजों को लक्ष्य बनाकर (प्रगाहसे) = इस शरीर का आलोड़न करता है। तेरे कारण अन्नमयकोष में [वाज्=वज् गतौ] गतिशीलता -क्रियामयता होती है। प्राणमयकोश में वाज=शक्ति का संचार होता है। मनोमयकोश में यह सोम वाज-त्याग [sacrifice] की भावना भरता है और यही विज्ञानमयकोश में वाज्- ज्ञान का भी कारण बनता है। इस प्रकार यह सोम प्रत्येक कोष को उस कोष की विभूति से अलंकृत करनेवाला होता है। यह व्यक्ति इस सोम से चमक उठता है। 
Essence
सोम मेरे जीवन में उल्लास दे इसके कारण मेरे शरीर में आत्मा का राज्य हो और मेरा प्रत्येक कोश विभूति- सम्पन्न हो ।
Subject
सोम के अनुपात में