Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 431

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्दुः꣢ पविष्ट꣣ चा꣢रु꣣र्म꣡दा꣢या꣣पा꣢मु꣣प꣡स्थे꣢ क꣣वि꣡र्भ꣢꣯गाय ॥४३१॥

इ꣡न्दुः꣢ । प꣣विष्ट । चा꣡रुः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । अ꣣पा꣢म् । उ꣣प꣡स्थे꣢ । उ꣣प꣢ । स्थे꣣ । कविः꣢ । भ꣡गा꣢꣯य ॥४३१॥

Mantra without Swara
इन्दुः पविष्ट चारुर्मदायापामुपस्थे कविर्भगाय ॥

इन्दुः । पविष्ट । चारुः । मदाय । अपाम् । उपस्थे । उप । स्थे । कविः । भगाय ॥४३१॥

Samveda - Mantra Number : 431
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सोम का नाम ‘इन्दु' भी है। यह बिन्दु का ही रूपान्तर है। बिन्दु सोमकणों का नाम है—‘मरणं बिन्दुपातेन, जीवनं बिन्दुधारणात् ' । [ इन्दति to be powerful] इसका नाम इन्दु इसलिए पड़ा कि यह सम्पूर्ण शक्ति का स्रोत है। यह (पविष्ट)= मेरे जीवन को पवित्र बनाता है। सोम से उत्पन्न ‘शक्ति, पवित्रता व ज्ञान' ये सब तत्त्व मिलकर (चारु:) = मेरे जीवन के सौन्दर्य का हेतु होते हैं। (मदाय) = यह जीवन मेरे उल्लास के लिए होता है। सौन्दर्य के साथ उल्लास का स्वाभाविक सम्बन्ध है। सौन्दर्य व उल्लास से युक्त होकर यह (अपाम्) = कर्मों के (उपस्थे) = मध्य में बिराजता है। यह कर्मों से घबरा कर पर्वत कन्दराओं का आश्रय नहीं करता। यह कवि बनकर कर्म करता है जिससे उनमें उलझ न जाए। (कविः) = क्रान्तदर्शी, तत्त्वद्रष्टा होने से उन कर्मों को यह असक्तभाव से करता चलता है। कर्म उसके लिए स्वाभाविक हो जाते हैं। यह (भगाय) = ऐश्वर्यादि छह भगों की प्राप्ति के समर्थ होता है। उन्हें प्राप्त करके भगवान्-सा बन जाता है। विद्वान् लोग इन्हें वीर मानकर आदर देने लगते हैं। यह मनुष्य के उत्कर्ष की परिनिष्ठा होती है उसका उत्कर्ष यहाँ चरम विकास पर होता है। 
Essence
मैं सोमपान से सुन्दर, उल्लासमय, कर्मठ, क्रान्तदर्शी व अनासक्त [वैराग्य युक्त] जीवनवाला बनूँ।
Subject
उत्कर्ष की परिनिष्ठा