Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 430

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हे꣢꣫ दक्षा꣣या꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ वा꣣जी꣡ धना꣢य ॥४३०॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महे꣢ । द꣡क्षा꣢꣯य । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । वा꣣जी꣢ । ध꣡ना꣢꣯य ॥४३०॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय ॥

पवस्व । सोम । महे । दक्षाय । अश्वः । न । निक्तः । वाजी । धनाय ॥४३०॥

Samveda - Mantra Number : 430
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = सोम! तू (पवस्व) = मेरे जीवन को पवित्र कर जिससे (महेक्षाय) = महान् दक्षता के लिए मैं समर्थ होऊँ। मैं प्रत्येक कार्य को कुशलता से करूँ। मेरी आत्मा अत्यन्त संस्कृत हो जिससे कि मेरा व्यवहार पूर्ण सभ्यतावाला हो । मेरे किसी भी कार्य में अनार्यता-अकुशलता न टपके। (‘योगः कर्मसु कौशलम्) = कर्मों में कुशलता ही तो योग है। मैं इस योग को इस सोम पान के द्वारा प्राप्त करनेवाला बनूँ।

इस सोमपान से मेरा जीवन (अश्वो न निक्तोवाजी) = [निज् - शुचि का पोषण] एक बड़े शुद्ध व पुष्ट घोड़े के समान शक्तिशाली हो । जिस घोड़े को बड़ा साफ-सुथरा रक्खा जाता और जो उचित पोषण प्राप्त करता है उसकी भाँति मैं इस सोमपान से शक्तिशाली बनूँ। (धनाय) = यह सोमपान मुझे धन प्राप्त करने योग्य बनाए । स्वस्थ, नीरोग व सुन्दराकृति पुरुष धन कमाने में भी सफल होता ही है। 
Essence
सोमपान से मुझे दक्षता, शक्ति व धन प्राप्ति की योग्यता प्राप्त हो । 
Subject
भौतिक उत्कर्ष