Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 422

1875 Mantra
Devata- सोमः Rishi- विमद ऐन्द्रः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भ꣣द्रं꣢ नो꣣ अ꣡पि꣢ वातय꣣ म꣢नो꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣡ क्रतु꣢꣯म् । अ꣡था꣢ ते स꣣ख्ये꣡ अन्ध꣢꣯सो꣣ वि꣢ वो꣣ म꣢दे꣣ र꣢णा꣣ गा꣢वो꣣ न꣡ यव꣢꣯से꣣ वि꣡व꣢क्षसे ॥४२२॥

भ꣣द्र꣢म् । नः꣣ । अ꣡पि꣢꣯ । वा꣣तय । म꣡नः꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡थ꣢꣯ । ते꣣ । सख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । वि । वः꣣ । म꣡दे꣢꣯ । र꣡ण꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । न । य꣡व꣢꣯से । वि꣡व꣢꣯क्षसे ॥४२२॥

Mantra without Swara
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् । अथा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणा गावो न यवसे विवक्षसे ॥

भद्रम् । नः । अपि । वातय । मनः । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अथ । ते । सख्ये । स । ख्ये । अन्धसः । वि । वः । मदे । रण । गावः । न । यवसे । विवक्षसे ॥४२२॥

Samveda - Mantra Number : 422
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो! (नः) = हमारे (मनः) = मन को (भद्रम् अपि वातय) = भद्रता की ओर प्रेरित कीजिए हमारे मन कभी अभद्रता की ओर न झुकें, कभी अशुभ का चिन्तन न करें। भद्रता के साथ (दक्षम्) = हमारे मन को दक्षता की ओर प्रेरित कीजिए | कठिन से कठिन समस्या को हम सुगमता से सुलझानेवाले हों। हमारा मन सदा resourceful हो - उपाय का चिन्तन कर सके। हम संकट में घबड़ा न जाएँ। भद्र बनें पर भोंदू न हों। इस भद्रता और दक्षता के साथ (उत क्रतुम्) = हमारे मनों में कर्म संकल्प भी प्राप्त कराइए। हमारा मन कभी आलस्य, तन्द्रा व निद्रा की ओर झुकाव न रक्खे।

इस प्रकार, भद्रता, दक्षता तथा क्रतुमयता की साधना के (अथा) = बाद (ते सख्ये) = हे प्रभो ! हम तेरी मित्रता में (रणा) = आनन्द का अनुभव करें। वस्तुतः प्रभु की उपासना इन तीन बातों के बिना सम्भव भी तो नहीं।

जिस समय जीव प्रभु से यह प्रार्थना करता है उस समय बीच में उल्लंघन करते हुए प्रभु कहते हैं कि (वः) = अपने (अन्धसः) = सोम के (वि-मदे) = उत्कृष्ट हर्ष में तू (रणा) = आनन्द का अनुभव कर। सोम की रक्षा ही मेरी उपासना है। जीव प्रभु की इस प्रेरणा को सुनता हुआ कहता है कि मैं आपकी उपासना में उसी प्रकार आनन्द का अनुभव करूँ। । न=जैसेकि (विवक्षसे यवसे) = बढ़ी हुई चरी में (गाव:त्रः) = गौवें आनन्द का अनुभव करती हैं। उस समय उनकी पीरट पर पड़ा हुआ एक-आध डण्डा उन्हें दुःखी नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त प्रभु के प्रेम में निमग्न हुआ-हुआ कष्टों को कष्ट ही नहीं समझता ।

इसी ऊँची स्थिति को प्राप्त हुआ हुआ भी यह 'विमद' + मदशून्य, गर्वरहित बना रहता है। यही तो इसके जीवन का सौन्दर्य है। ऊँची स्थिति में पहुँचना योग है, परन्तु वहाँ पहुँचकर गर्वित हो जाना योगभ्रष्ट हो जाना है। यह व्यक्ति योगभ्रष्ट नहीं होता।
Essence
मेरा जीवन भद्रता, दक्षता, क्रतुमयता, प्रभु मित्रता, सोमरक्षा व गर्वशून्यता से अलंकृत हो।
Subject
भलमानस न कि भोंदू